ज़माने भर का कोई इस क़दर अपना न हो जाए
कि अपनी ज़िंदगी ख़ुद आपको बेगाना हो जाए।
सहर होगी ये शब बीतेगी और ऐसी सहर होगी
कि बेहोशी हमारे होश का पैमाना हो जाए।
किरन फूटी है ज़ख़्मों के लहू से : यह नया दिन है :
दिलों की रोशनी के फूल हैं – नज़राना हो जाए।
ग़रीबुद्दहर थे हम; उठ गए दुनिया से अच्छा है
हमारे नाम से रोशन अगर वीराना हो जाए।
बहुत खींचे तेरे मस्तों ने फ़ाक़े फिर भी कम खींचे
रियाज़त ख़त्म होती है अगर अफ़साना हो जाए।
चमन खिलता था वह खिलता था, और वह खिलना कैसा था
कि जैसे हर कली से दर्द का याराना हो जाए।
वह गहरे आसमानी रंग की चादर में लिपटा है
कफ़न सौ ज़ख़्म फूलों में वही पर्दा न हो जाए।
इधर मैं हूँ, उधर मैं हूँ, अजल तू बीच में क्या है?
फ़कत एक नाम है, यह नाम भी धोका न हो जाए।
वो सरमस्तों की महफ़िल में गजानन मुक्तिबोध आया
सियासत ज़ाहिदों की ख़ंदए-दीवाना हो जाए
- शमशेर बहादुर सिंह
13 November, 2009
मुक्तिबोध को हार्दिक श्रद्धांजलि
मुक्तिबोध की कविताएं,कहानियाँ,लेख,निबंध सभी ने हिन्दी को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया है। कवि के रूप में उन्हें सर्वाधिक लोकप्रियता मिली। मुक्तिबोध हिन्दी कविता में एक अवधारणा बन चुके हैं। अपने समकालीन और परवर्ती पीढ़ियों को समान रूप से प्रभावित करने में कम ही कवि सफल हो पाते हैं। मुक्तिबोध ऐसे ही विरले कवियों में से एक हैं। मुक्तिबोध विगत कई दशकों से हिन्दी आलोचना के केन्द्र में हैं। उनकी कविताओं से गुजरे बिना हिन्दी साहित्य की कोई यात्रा पूरी नहीं होती। हिन्दी की प्रगतिशील कहे जाने वाली काव्य-धारा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक उपलब्धि मुक्तिबोध की कविताएं हैं। मुक्तिबोध की कविताएं उन विलक्षण कविताओं में से हैं जिन्हें आत्मसात करना एक सर्वथा नए व्यक्तित्व को धारण करना है। मुक्तिबोध की कविताएं आपको सहज नहीं रहने देती। बेकल करती हैं। सुविधावाद का उनसे जन्मजात वैर है। ऐसी शक्तिशाली कविताएं लिखने वाले महान कवि का हिन्दी समाज सदैव श्रृणी रहेगा।
अभी तक मुक्तिबोध की आलोचना और कहानियों का उचित आलोचनात्मक मूल्यांकन नहीं हो सका है। मुक्तिबोध के जन्मदिन पर यह ध्यान करना सुखद है कि कुछ युवा शोधार्थियों ने मुक्तिबोध की पत्र,कहानियों और आलोचना पर नए सिरे से ध्यान देना शुरू किया है। उम्मीद है इस दिशा में होने वाली प्रगति हिन्दी साहित्य में मुक्तिबोध के मुल्यांकन की नई दिशा प्रशस्त करेगी। इन्हीं शब्दों के साथ इस कालजयी रचनाकार को उसके जन्मदिन के अवसर पर हार्दिक श्रद्धांजलि।
अभी तक मुक्तिबोध की आलोचना और कहानियों का उचित आलोचनात्मक मूल्यांकन नहीं हो सका है। मुक्तिबोध के जन्मदिन पर यह ध्यान करना सुखद है कि कुछ युवा शोधार्थियों ने मुक्तिबोध की पत्र,कहानियों और आलोचना पर नए सिरे से ध्यान देना शुरू किया है। उम्मीद है इस दिशा में होने वाली प्रगति हिन्दी साहित्य में मुक्तिबोध के मुल्यांकन की नई दिशा प्रशस्त करेगी। इन्हीं शब्दों के साथ इस कालजयी रचनाकार को उसके जन्मदिन के अवसर पर हार्दिक श्रद्धांजलि।
लेबल:
अँधेरे में,
एक साहित्यिक की डायरी,
कविता
04 November, 2009
अँधेरे में - 2
सूनापन सिहरा ,
अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले उभरे ,
शुन्य के मुख पर सलवटें स्वर की,
मेरे ही उर पर ,धँसती हुई सिर,
छटपटा रही हैं शब्दों की लहरें
मीठी हैं दुःसह !!
अरे, हाँ सांकल ही रह-रह
बजती है द्वार पर
कोई मेरी बात मुझे बताने के लिए ही
बुलाता है , बुलाता है ( ह्रदय को सहला
मानो किसी जटिल प्रसंग में सहसा
होंठो पर होंठ रख , कोई सच-सच बात
सीधे-सीधे कहने को तड़प जाए मेरा जी ...
इस तरह, सांकल ही रह-रह, बजती है द्वार पर )
आधी रात, इतने अँधेरे में कौन आया मिलने ?
विमान प्रतीक्षातुर कुहरे में घिरा हुआ
द्युतिमय मुख - वह प्रेमभरा चेहरा -
भोला-भाला भाव-
पहचानता हूँ बाहर जो खड़ा है !!
यह वही व्यक्ति है, जी हाँ !
जो मुझे तिलिस्मी खोह में दिखा था
अवसर - अनवसर
प्रकट जो होता ही रहता,
मेरी सुविधावों का न तनिक ख्याल कर
चाहे जहाँ, चाहे जिस समय उपस्थित,
चाहे जिस रूप में चाहें जिन प्रतीकों में प्रस्तुत ;
इशारे से बताता है, समझाता रहता ,
ह्रदय को देता है बिजली के झटके !!
अरे, उसके चहरे पर खिलती है हैं सुबहें ,
गलों पर चट्टानी चमक पठार की
आँखों में किरनीली शांति की लहरें ,
उसे देख, प्यार उमड़ता है अनायास !
लगता है - दरवाजा खोलकर
बाँहों में कस लूँ
ह्रदय में रख लूँ
घुल जाऊँ, मिल जाऊँ लिपटकर उससे
परन्तु, भयानक खड्डे के अँधेरे में आहत
और क्षत विक्षत, मैं पड़ा हुआ हूँ;
शक्ति ही नहीं है कि उठ सकूँ ज़रा भी
( यह भी तो सही है कि
कमजोरियों से ही मोह है मुझको )
इसीलिए, टालता हूँ उस मेरे प्रिय को
कतराता रहता,
डरता हूँ उससे
वह बिठा देता है तुंग शिखर के
ख़तरनाक ,खुरदरे कगार-तट पर ;
शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता मुझको
कहता -' पार करो पर्वत-संधि के गहवर,
रस्सी के पुल पर चलकर
दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुँचो '
अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों कि यात्रा,
मुझे डर लगता है ऊंचाईयों से;
बजाने दो सांकल !!
उठने दो अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुलों;
वह जन ....वैसे ही
आप चला जायेगा आया था जैसे
खड्डे के अँधेरे में मैं पड़ा रहूँगा
पीड़ाएँ समेटे !!
क्या करूँ , क्या नहीं करूँ मुझे बताओ;
इस तम्- शुन्य में तैरती है जगत-समीक्षा
की हुई उसकी
(सह नही सकता)
विवेक-विक्षोभ महान उसका
तम्-अंतराल में (सह नही सकता)
अंधियारे मुझमें द्युति-आकृति-सा
भविष्य का नक्शा दिया हुआ उसका
सह नही सकता !!
नहीं, नहीं,उसको मैं छोड़ नहीं सकूँगा
सहना पड़े मुझे चाहे जो भले ही
कमजोर घुटनों को बार-बार मसल,
लड़खडाता हुआ मैं
उठता हूँ दरवाजा खोलने,
चेहरे के रक्तहीन विचित्र शून्य को गहरे
पोंछता हूँ हाथ से
अँधेरे के ओर-छोर टटोल-टटोलकर
बढ़ता हूँ आगे
पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव,
हाथों से महसूस करता हूँ दिशाएँ
साँसों से अनुभव करता हूँ दुनिया
मस्तक अनुभव करता है आकाश,
दिल में तड़पता है अँधेरे का अंदाज
आँखे ये तथ्य को सूंघती-सी लगती
केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी
आत्मा में,भीषण
सत-चित-वेदना जल उठी , दहकी
विचार हो गये विचरण-सहचर
बढ़ता हूँ आगे,
चलता हूँ संभल-संभलकर
द्वार टटोलता,
जंग-खाई, जमी हुई, जबरन
चिटखनी हिलाकर
जोर लगा, दरवाजा खोलता,
झांकता हूँ बाहर ...
सुनी है राह, अजीब है फैलाव,
सर्द अँधेरा
ढीली आँखों से देखते हैं विश्व
उदास तारे
हर बार सोच और हर बार अफ़सोस
हर बार फ़िक्र
के कारण बढ़े हुए दर्द का मानो कि दूर वहाँ, दूर वहाँ
अँधियारा पीपल देता है पहरा
हवाओं की निःसंग लहरों में कांपती
कुत्तों कि दूर-दूर अलग-अलग आवाज़,
टकराती रहती सियारों की ध्वनि से.
कांपती हैं दूरियाँ, गूंजते हैं फासले
(बाहर कोई नहीं, कोई नहीं बाहर)
इतने में अंधियारे सुने में कोई चीख गया है
रात का पक्षी
कहता है :
'वह चला गया है,
वह नहीं आएगा, आएगा ही नहीं
अब तेरे द्वार पर
वह निकल गया है गाँव में शहर में !
उसको तू खोज अब
उसका तू शोध कर !
वह तेरी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति,
उसका तू शिष्य है (यद्यपि पलातक ...)
वह तेरी गुरु है ...'
अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले उभरे ,
शुन्य के मुख पर सलवटें स्वर की,
मेरे ही उर पर ,धँसती हुई सिर,
छटपटा रही हैं शब्दों की लहरें
मीठी हैं दुःसह !!
अरे, हाँ सांकल ही रह-रह
बजती है द्वार पर
कोई मेरी बात मुझे बताने के लिए ही
बुलाता है , बुलाता है ( ह्रदय को सहला
मानो किसी जटिल प्रसंग में सहसा
होंठो पर होंठ रख , कोई सच-सच बात
सीधे-सीधे कहने को तड़प जाए मेरा जी ...
इस तरह, सांकल ही रह-रह, बजती है द्वार पर )
आधी रात, इतने अँधेरे में कौन आया मिलने ?
विमान प्रतीक्षातुर कुहरे में घिरा हुआ
द्युतिमय मुख - वह प्रेमभरा चेहरा -
भोला-भाला भाव-
पहचानता हूँ बाहर जो खड़ा है !!
यह वही व्यक्ति है, जी हाँ !
जो मुझे तिलिस्मी खोह में दिखा था
अवसर - अनवसर
प्रकट जो होता ही रहता,
मेरी सुविधावों का न तनिक ख्याल कर
चाहे जहाँ, चाहे जिस समय उपस्थित,
चाहे जिस रूप में चाहें जिन प्रतीकों में प्रस्तुत ;
इशारे से बताता है, समझाता रहता ,
ह्रदय को देता है बिजली के झटके !!
अरे, उसके चहरे पर खिलती है हैं सुबहें ,
गलों पर चट्टानी चमक पठार की
आँखों में किरनीली शांति की लहरें ,
उसे देख, प्यार उमड़ता है अनायास !
लगता है - दरवाजा खोलकर
बाँहों में कस लूँ
ह्रदय में रख लूँ
घुल जाऊँ, मिल जाऊँ लिपटकर उससे
परन्तु, भयानक खड्डे के अँधेरे में आहत
और क्षत विक्षत, मैं पड़ा हुआ हूँ;
शक्ति ही नहीं है कि उठ सकूँ ज़रा भी
( यह भी तो सही है कि
कमजोरियों से ही मोह है मुझको )
इसीलिए, टालता हूँ उस मेरे प्रिय को
कतराता रहता,
डरता हूँ उससे
वह बिठा देता है तुंग शिखर के
ख़तरनाक ,खुरदरे कगार-तट पर ;
शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता मुझको
कहता -' पार करो पर्वत-संधि के गहवर,
रस्सी के पुल पर चलकर
दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुँचो '
अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों कि यात्रा,
मुझे डर लगता है ऊंचाईयों से;
बजाने दो सांकल !!
उठने दो अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुलों;
वह जन ....वैसे ही
आप चला जायेगा आया था जैसे
खड्डे के अँधेरे में मैं पड़ा रहूँगा
पीड़ाएँ समेटे !!
क्या करूँ , क्या नहीं करूँ मुझे बताओ;
इस तम्- शुन्य में तैरती है जगत-समीक्षा
की हुई उसकी
(सह नही सकता)
विवेक-विक्षोभ महान उसका
तम्-अंतराल में (सह नही सकता)
अंधियारे मुझमें द्युति-आकृति-सा
भविष्य का नक्शा दिया हुआ उसका
सह नही सकता !!
नहीं, नहीं,उसको मैं छोड़ नहीं सकूँगा
सहना पड़े मुझे चाहे जो भले ही
कमजोर घुटनों को बार-बार मसल,
लड़खडाता हुआ मैं
उठता हूँ दरवाजा खोलने,
चेहरे के रक्तहीन विचित्र शून्य को गहरे
पोंछता हूँ हाथ से
अँधेरे के ओर-छोर टटोल-टटोलकर
बढ़ता हूँ आगे
पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव,
हाथों से महसूस करता हूँ दिशाएँ
साँसों से अनुभव करता हूँ दुनिया
मस्तक अनुभव करता है आकाश,
दिल में तड़पता है अँधेरे का अंदाज
आँखे ये तथ्य को सूंघती-सी लगती
केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी
आत्मा में,भीषण
सत-चित-वेदना जल उठी , दहकी
विचार हो गये विचरण-सहचर
बढ़ता हूँ आगे,
चलता हूँ संभल-संभलकर
द्वार टटोलता,
जंग-खाई, जमी हुई, जबरन
चिटखनी हिलाकर
जोर लगा, दरवाजा खोलता,
झांकता हूँ बाहर ...
सुनी है राह, अजीब है फैलाव,
सर्द अँधेरा
ढीली आँखों से देखते हैं विश्व
उदास तारे
हर बार सोच और हर बार अफ़सोस
हर बार फ़िक्र
के कारण बढ़े हुए दर्द का मानो कि दूर वहाँ, दूर वहाँ
अँधियारा पीपल देता है पहरा
हवाओं की निःसंग लहरों में कांपती
कुत्तों कि दूर-दूर अलग-अलग आवाज़,
टकराती रहती सियारों की ध्वनि से.
कांपती हैं दूरियाँ, गूंजते हैं फासले
(बाहर कोई नहीं, कोई नहीं बाहर)
इतने में अंधियारे सुने में कोई चीख गया है
रात का पक्षी
कहता है :
'वह चला गया है,
वह नहीं आएगा, आएगा ही नहीं
अब तेरे द्वार पर
वह निकल गया है गाँव में शहर में !
उसको तू खोज अब
उसका तू शोध कर !
वह तेरी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति,
उसका तू शिष्य है (यद्यपि पलातक ...)
वह तेरी गुरु है ...'
लेबल:
अँधेरे में
08 October, 2009
अँधेरे में - 1
जिन्दगी के ...
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;
आवाज़ पैरों की देती है सुनाई
बार-बार ... बार-बार ,
वह नहीं दिखता ..... नहीं ही दिखता
किन्तु, वह रहा घूम
तिलिस्मी खोह में गिरफ्तार कोई एक ;
भीत- पार आती पास से,
गहन रहस्यमय अंधकार - ध्वनी- सा
अस्तित्व जनाता
अनिवार एक
और, मेरे ह्रदय की धक् धक्
पूछती है- वह कौन
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई !
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीत से
फूले हुए पलस्तर,
खिरती है चूनेभरी रेत
खिसकती हैं पपरियाँ इस तरह -
खुद-ब-खुद
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है ,
स्वयमपि
मुख बन जाता है दिवाल पर ,
नुकीली नाक है और
भव्य ललाट है
दृढ हनु;
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति
कौन वह दिखाई जो देता ,पर नही जाना जाता है !!
कौन मनु ?
बाहर शहर के पहाड़ी के उस पार, तालाब ...
सब तरफ अँधेरा,
प्रशांत जल,
पर, भीतर से उभरती है सहसा
सलिल के तम्- श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति
कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फ़ैल जाता है
और मुस्काता है ,
पहचान बताता है ;
किन्तु, मैं हतप्रभ
नहीं वह समझ में आता
अरे ! अरे !
तालाब के आस पास, अँधेरे में वन वृक्ष
चमक चमक उठाते हैं हरे हरे, अचानक
वृक्षो के शीश पर नाच नाच उठती हैं बिजलियाँ,
शाखाएँ, डालियाँ झूमकर झपटकर
चीख़, एक - दुसरे पर पटकती है सर की अकस्मात्
वृक्षों के अँधेरे में छिपी हुयी किसी एक
तिलिस्मी खोह का शिला-द्वार
खुलता है धड़ से
...............
घुसती है लाल-लाल मशाल अजीब-सी,
अन्तराल-विवर के तम् में
लाल-लाल कुहरा;
कुहरे में, सामने, रक्तालोक स्नात-पुरुष एक,
रस्यमय साक्षात् !!
तेजोप्रभावमय उसका ललाट देख ,
मेरे अंग-अंग में अजीब एक थर-थर
गौरवर्ण, दीप्त-दृग, सौम्यमुख
संभावित स्नेह-सा प्रिय रूप देखकर
विलक्षण शंका,
भव्य आजानुभुज देखते ही साक्षात्
गहन एक संदेह
वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है,
पूर्ण अवस्था वह
निज-संभावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिभाओं की
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव,
ह्रदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,
आत्मा की प्रतिमा
किंतुं वह फटे हुए वस्त्र क्यों पहने है ?
उसका स्वर्ण-वर्ण मुख मैला क्यों ?
वक्ष पर इतना बड़ा घाव कैसे हो गया ?
उसने कारावास- दुःख झेला क्यों ?
उसकी इतनी भयानक स्थिति क्यों है ?
रोटी उसे कौन पहुचता है ?
कौन पानी देता है ?
फिर भी, उसके मुख पर स्मित क्यों है ?
प्रचंड शक्तिमान क्यों दिखई देता है ?
प्रश्न थे गंभीर, शायद खतरनाक भी,
इसीलिए बहार के गुंजान
जंगलो से आती हुई हवा ने
फूंक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी .....
कि मुझको यूँ अँधेरे में पकड़कर
मौत कि सजा दी !
किसी काले 'डैश' की घनी काली पट्टी ही
आँखों पर बंध गई,
किसी खड़ी पाई कि सूली पर मैं टांग दिया गया,
किसी शुन्य बिंदु के अंधियारे खड्डे में
गिरा दिया गया मैं
अचेतन स्थिति में !
लेबल:
अँधेरे में
20 August, 2009
अंधेरे में ( एक अंश)
एकाएक वह व्यक्ति
आँखों के सामने
गलियों में, सड़कों पर, लोगों की भीड़ में
चला जा रहा है।
वही जन जिसे मैंने देखा था गुहा में।
धड़कता है दिल
कि पुकारने को खुलता है मुँह
कि अकस्मात्--
वह दिखा, वह दिखा
वह फिर खो गया किसी जन यूथ में...
उठी हुई बाँह यह उठी रह गयी !!
अनखोजी निज-समृद्धि का वह परम उत्कर्ष,
परम अभिव्यक्ति
मैं उसका शिष्य हूँ
वह मेरी गुरू है,
गुरू है !!
वह मेरे पास कभी बैठा ही नहीं था,
वह मेरे पास कभी आया ही नहीं था,
तिलस्मी खोह में देखा था एक बार,
आख़िरी बार ही।
पर, वह जगत् की गलियों में घूमता है प्रतिपल
वह फटेहाल रूप।
तडित्तरंगीय वही गतिमयता,
अत्यन्त उद्विग्न ज्ञान-तनाव वह
सकर्मक प्रेम की वह अतिशयता
वही फटेहाल रूप !!
परम अभिव्यक्ति
लगातार घूमती है जग में
पता नहीं जाने कहाँ, जाने कहाँ
वह है।
इसीलिए मैं हर गली में
और हर सड़क पर
झाँक-झाँक देखता हूँ हर एक चेहरा,
प्रत्येक गतिविधि
प्रत्येक चरित्र,
व हर एक आत्मा का इतिहास,
हर एक देश व राजनैतिक परिस्थिति
प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श
विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति !!
खोजता हूँ पठार...पहाड़...समुन्दर
जहाँ मिल सके मुझे
मेरी वह खोयी हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म-सम्भवा।
आँखों के सामने
गलियों में, सड़कों पर, लोगों की भीड़ में
चला जा रहा है।
वही जन जिसे मैंने देखा था गुहा में।
धड़कता है दिल
कि पुकारने को खुलता है मुँह
कि अकस्मात्--
वह दिखा, वह दिखा
वह फिर खो गया किसी जन यूथ में...
उठी हुई बाँह यह उठी रह गयी !!
अनखोजी निज-समृद्धि का वह परम उत्कर्ष,
परम अभिव्यक्ति
मैं उसका शिष्य हूँ
वह मेरी गुरू है,
गुरू है !!
वह मेरे पास कभी बैठा ही नहीं था,
वह मेरे पास कभी आया ही नहीं था,
तिलस्मी खोह में देखा था एक बार,
आख़िरी बार ही।
पर, वह जगत् की गलियों में घूमता है प्रतिपल
वह फटेहाल रूप।
तडित्तरंगीय वही गतिमयता,
अत्यन्त उद्विग्न ज्ञान-तनाव वह
सकर्मक प्रेम की वह अतिशयता
वही फटेहाल रूप !!
परम अभिव्यक्ति
लगातार घूमती है जग में
पता नहीं जाने कहाँ, जाने कहाँ
वह है।
इसीलिए मैं हर गली में
और हर सड़क पर
झाँक-झाँक देखता हूँ हर एक चेहरा,
प्रत्येक गतिविधि
प्रत्येक चरित्र,
व हर एक आत्मा का इतिहास,
हर एक देश व राजनैतिक परिस्थिति
प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श
विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति !!
खोजता हूँ पठार...पहाड़...समुन्दर
जहाँ मिल सके मुझे
मेरी वह खोयी हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म-सम्भवा।
लेबल:
अंधेरे में - एक अंश
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