30 October, 2011

मुक्तिबोध

हरिशंकर परसाई

राजनंदागांव में तालाब के किनारे पुराने महल का दरवाजा है - नीचे बड़े फाटक के आसपास कमरे हैं,दूसरी मंजिल पर एक बड़ा हाल और कमरे,तीसरी मंजिल पर कमरे और खुली छत। तीन तरफ से तालाब घेरता है। पुराने दरवाजे और खिड़कियां,टूटे हुए झरोखे,कहीं खिसकती हुई ईंटेंउखड़े हुए पलस्तर दीवारें। तालाब और आगे विशाल मैदान। शाम को जब ज्ञानरंजन और मैं तालाब की तरफ गए और वहां से धुंधलके में उस महल को देखा,तो एक भयावह रहस्य में लिपटा वह नजर आया।

दूसरी मंजिल के हाल के एक कोने में विकलांग मुक्तिबोध खाट पर लेटे थे। लगा,जैसे इस आदमी का व्यक्तित्व किसी मजबूत किले सा है। कई लड़ाईयों के निशान उस पर हैं। गोलों के निशान हैं,पलस्तर उखड़ गया है,रंग समय ने धो दिया है- मगर जिसकी मजबूत दीवारें नींव में जमी हैं और व​ह सिर ताने गरिमा के साथ खड़ा है।

मैंने मजाक ​कीइसमें तो ब्रह्मराक्षस ही रह सकता है।“

मुक्तिबोध की एक कविता है ‘ब्रह्मराक्षस’। एक कहानी भी है जिसमें शापग्रस्त राक्षस महल के खण्डहर में रहता है।

मुक्तिबोध हंसे। बोले, “कुछ भी कहो पार्टनर अपने को यह जगह पसंद है।“

मुक्तिबोध में मैत्री भाव बहुत था। बहुत-सी बातें वो मित्र को सम्बोधित करते हुए कहते थे। कविता,निबन्ध,डायरी सबमें यह ‘मित्र’ प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से रहता है। एक खास अदा थी उनकी वो मित्र को ‘पार्टनर’ कहते थे। कुछ इस तरह बातें करते थे - कुछ भी कहो पार्टनरतुम्हारा यह विनोद है ताकतवर...आपको चाहे बुरा लगे पार्टनर,पर अमुक आदमी अपने को तो बिल्कुल नहीं पटता।“ ज्यादा  प्यार में आते तो कहते कि “आप देखना मालक,ये सब भागते नजर आएंगे।“

मुक्तिबोध जैसे सपने में डूबते से बोले,जहां आप बैठे हैं। वहां किसी समय में राजा की महफिल जमती थी। खूब रोशनी की चकाचौंध थी। कुछ भी कहो,पार्टनर, ‘फ्युडलिज्म’ (सामन्तवाद) में एक शान तो थी...बरसात में आईये यहां। इस कमरे में रात को साइए। तालाब खूब जोर पर होता है,सांय-सांय हवा चलती है और पानी रात-भर दीवारों में टकराकर छप-छप करता है...कभीकभी तो ऐसा लगता है,जैसे कोई नर्तकी नाच रही हो,घुंघरुओं की आवाज सुनाई पड़ती है। पिछले साल शमशेर आए थे। हम लोग दो-तीन बजे सुबह तक सुनते रहे...और पार्टनर बहुत खूबसूरत उल्लू...मैं क्या बताउं आपसेवैसा खूबसूरत उल्लू मैंने कभी देखा ही नहीं...कभी चमगादड़ें घुस आती हैं....बड़े उत्साह से वे उस वातावरण की बातें करते रहे। अपनी बिमारी का जरा अहसास नहीं।

दोपहर में हम लोग पहुंचे थे। हमें देखा,तो मुक्तिबोध सदा की तरह- अरे वाह,अरे वाह !” कहते हुए हंसते रहे। मगर दूसरे ही क्षण उनकी आंखों में आंसु छलक पड़े। डेढ़-एक महीने पहले वो जबलपुर आए थे। एक्जिमा से परेशान थे। बहुत कमजोर। बोलते-बोलते दम फूल आता था। तब मुझे वे बहुत शंकाग्रस्त लगे थे। डरे हुए थे। तब भी उनकी आंखो में आंसू छलछला आए थे,जब उन्होंने कहा था- पार्टनर अब बहुत टूट गए हम। ज्यादा गाड़ी खिंचेगी नहीं। दस,पांच साल मिल जाएं,तो कुछ काम ​जमकर कर लूं।“

आंसू कभी पहले उनकी आंखों में नहीं देखे थे। इस पर हमलोग विशेष चिन्तित हुए। मित्रों ने बहुत जोर दिया कि आप यहां एक महीने रुककर चिकित्सा करा लें। पर उन्हें रुग्ण पिता को देखने नागपुर जाना था। सप्ताह-भर में लौट आने कर वादा करक वे चले गए। फिर,वे लौटे नहीं।

क्षण-भर में ही वे संभल गए। पूछा, “आप लोगों का सामान कहां है ?

शरद कोठारी ने कहा, “मेरे घर रखा है।“

वे बोले,वाह साहब,इसका क्या मतलब आप लोग मेरे यहां आए हैं न ?

हम लोगों ने परस्पर देखा। शरद मुस्कराया। इस पर हम लोग मुक्तिबोध को कई बार चिढ़ाया करते थे— गुरू,कितने ही प्रगतिशील विचार हों,आपके,आदतों में फ्यूडल हो।

मेरा मेहमान हैमेरे घर सोएगा,मेरे घर खाएगा,कोई बिना चाय पिए नहीं जाएगा,होटल में मैं ही पैसे चुकाउंगा,सारे शहर को घर में खाना खिलाउंगा-यह सब क्या है ?

शरद को मुस्कराते देख वे भी मु​स्करा दिए। बोले,यह आपकी अनधिकार चेष्टा है,बल्कि साजिश है।

यह औपचारिक नहीं था। मुक्तिबोध की किसी भावना में औपरचारिकता नहींन स्नेह मेंन घृणा में,न क्रोध में। जिसे पसन्द नहीं करते थेउसकी तरफ घण्टे-भर बिना बोले आंख फाड़े देखते रहते थे। वह घबरा जाता था।

बिमारी की बात की,तो वैज्ञानिक तटस्थता से-जैसे ये हाथ-पांव और यह सिर उनके नहीं,किसी दूसरे के हैं। बड़ी निर्वैयक्तिकता से,जैसे किसी के अंग-अंग काटकर बात रहे हैं कि बीमारी कहां है,कैसे हुईक्या परिणाम है ?

तो यह है साहब,अपनी बीमारी—-बोलकर चुप हो गए।

फिर बोले, “चिट्ठियां आती हैं कि आप यहां आ जाइए या वहां चले जाइए। पर कैसे जाउं जाना क्या मेरे वश की बात है ?...हां,एक भयंकर कविता हो गई। सुनाउंगा नहीं। मुझे खुद उससे डर लगता है। बेहद डार्क,ग्लूमी ! भयंकर इमेंजें हैं। न जाने कैसी मन:स्थिती थी। कविता वात्सयायन जी को भेज दी है।...पर अब लगता है कि वैसी बात है नहीं। जिन्दगी में दम है। बहुत अच्छे लोग हैं,साथ। कितनी चिट्ठियां चिन्ता की आयी हैं। कितने लोग मुझे चंगा करना चाहते हैं ! कितना स्नेह,कितनी ममता है,आसपास!...पार्टनर,अब एक दूसरी कविता लिखी जाएगी। यानी ठीक बात लिखी जाएगी।"

ज्ञानरंजन ने कहापिछली भी सही थी और अब जो होगी,वह भी सही होगी।“

वे आश्वस्त-से लगे। हम लोगों ने समझाया कि बीमारी मामूली है,भोपाल में एक-दो महीने में ठीक हो जाएगी।

उनकी आंखों में चमक आ गई। बोले, “ठीक हो जाएगी न! मेरा भी यही ख्याल है। न हो पूरी ठीक,कोई बात नहीं। मैं लंगड़ाकर चल लूंगा। पर लिखने-पढ़ने लायक हो जाऊँ।“

इतने में प्रमोद वर्मा आ गए। देखते ही मुक्तिबोध फिर हंस पड़े,लो, “अरे लोये भी आ गए ! वाह,बड़ा मजा है साहब!”

प्रमोद और मैं शान्ता भाभी तथा रमेश से सलाह करने दूसरे कमरे में चले गए। इधर मुक्तिबोध ज्ञानरंजन से नए प्रकाशनों पर बातें करने लगे।

तय हुआ कि जल्दी भोपाल ले चलना चाहिए। मित्रों ने कुछ पैसा जहां-तहां से भेज दिया था। हम लोगों ने सलाह की कि इस रमेश के नाम से बैंक में जमा कर देना चाहिए।

मुक्तिबोध पर बड़ी विचित्र प्रतिक्रिया हुई इसकी। बिल्कुल बच्चे की तरह वे खीझ उठे। बोले,क्यों मेरे नाम से खाता क्यों नहीं खुलेगा मेरे ही नाम से जमा होना चाहिए। मुझे क्या आप लोग गैर-जिम्मेदार समझते हैं।

वे अड़ गए। खाता मेरे नाम से खुलेगा। थोड़ी देर बाद कहने लगे,बात यह है पार्टनर मेरी इच्छा है ​ऐसी। ‘आई विश इट।‘ मैं नहीं जानता कि बैंक में खाता होना कैसा होता है। एक नया अनुभव होगा मेरे लिए। तर्कहीन लालसा हो-पर है जरूर,कि एक बार अपना भी एकाउण्ट हो जाए! जरा इस सन्तोष को भी देखूं।

मुक्तिबोध हमेशा ही घोर आर्थिक संकट में रहते थे.अभावों का ओर-छोर नहीं था. कर्ज से लदे रहते थे. पैसा चाहते थे, पर पैसे को ठुकराते भी थे.

पैसे के लिए कोई काम विश्वास के प्रतिकूल नहीं किया। अचरज होता था कि जिसे पैसे-पैसे की तंगी है।वह रुपयों का मोह बिना खटके के कैसे छोड़ देता है। बैंक में खाता खुलेगा- यह कल्पना उनके लिए बड़ी उत्तेजक थी। गजानन माधव मुक्तिबोध का बैंक खाता है - यह अहसास वे करना चाहते थे। वे शायद अधिक सुरक्षित भी अनुभव करते।

तभी एक ज्येष्ठ लेखक की चिट्ठी आई कि आप घबराएं नहींहम कुछ लेखक जल्दी ही अखबार में आपकी सहायता के लिए अपील प्रकाशित करा रहे हैं।

चिट्ठी पढ़कर मुक्तिबोध बहुत उत्तेजित हो गए। झटके से तकिए पर थोड़े उठ गए और बोले, “यह क्या है दया के लिए अपील निकलेगी ! अब,भीख मांगी जाएगी मेरे लिए ! चन्दा होगा ! नहीं- मैं कहता हूं-यह नहीं होगा। मैं अभी मरा थोड़े ही हूं। मित्रों की सहायता मैं ले लूंगा-लेकिन मेर लिए चन्द्र की अपील! नहीं। यह नहीं होगा !”

हम लोगों ने उन्हें समझाया कि आपकी भावना से उन्हें परिचित करा दिया जाएगा और अपील नहीं निकलेगी।

उस शाम रमेश ने एक चिट्ठी लाकर दी जिसमें बीस रुपए के नोट थे। चिट्ठी उनके एक विद्यार्थी की थी। उसने लिखा था कि मैं एक जगह काम करके पढ़ाई का खर्चा चला रहा हूं। आपके प्रति मेरी श्रद्धा है। मैं देख रहा हूं कि अर्थाभाव के कारण आप जैसे साहित्यकार की ठीक चिकित्सा नहीं हो पा रही है। मैं ये बीस रुपए बचाए हैं। इन्हें आप ग्रहण करें। ये मेरी ही कमाई के हैं,इसलिए आप इन्हें लेने में संकोच न करें। स्वयं आपको रुपए देने का साहस मुझमें नहीं है,इसलिए इस तरह पहुंचा रहा हूं।

चिट्ठी और रुपए लिए वो बहुत देर तक खिड़की के बाहर देखते रहे। उनकी आंखे भर आयीं। बोलेयह लड़का गरीब है। उससे कैसे पैसे ले लूं ?

वहां एक अध्यापक बैठे थे। उन्होंने कहा,लड़का भावुक है। वापस कर देंगेतो उसे चोट पहुंचेगी। मुक्तिबोध बहुत द्रवित हो गए इस स्नेह से। बड़ी देर तक गुमसुम बैठे रहे।

भोपाल जाने की तैयारी होने लगी। उनका मित्र-भाव फिर जाग उठा। मुझसे कहने लगे, “पार्टनर,मैं आपसे एक साफ बात कहना  चाहता हूं। बुरा मत मानना। देखिए, आपकी जीविका लिखने से  चलती है। आप अब भोपाल मेरे साथ चलेंगे। वहां रहेंगे। आप लिख नहीं पाएंगे,तो आपको आर्थिक कष्ट होगा। मैं कहता हूं कि आप मेरे पैसे को अपना पैसा समझकर उपयोग में लाइए !”

मुक्तिबोध बहुत गम्भीर थे। हम लोग एक-दूसरे की तरफ देख रहे थे।

वे मेरी तरह जवाब के लिए आंखे उठाए थे और हम लोग हंसी रोके थे।

तभी मैंने कहा,आपके पैसे को अपना पैसा समझने को तैयार हूं। पर पैसा है कहां ?

प्रमोद जोर से हंस दिया। मुक्तिबोध भी हंस पड़े। फिर एकदम गम्भीर हो गए। बोले,  हां,यही तो मुश्किल है। यही तो गड़बड़ है।“

जो थोड़े से पैसे उनके हाथ में आ गए थे,वे कुलबुला रहे थे। उन्हें कितने ही कर्तव्य याद आ रहे थे। कोई मित्र कष्ट में है,किसी की पत्नी बीमार है,किसी की लड़की बीमार है,किसी के बच्चों के लिए कपड़े बनवाना है। उस अवस्था में जब वे खुद अपंग हो गए थे और अर्थाभाव से पीड़ित थे,वे दूसरों पर इन पैसों को खर्च कर देना चाहते थे। आगे भोपाल में तो इस बात पर उनसे बाकायदा युद्ध हुआ और बड़ी मुश्किल से हम उन्हें समझा सके कि रोगी क किसी के प्रति कोई कर्तव्य नहीं होतासबके कर्तव्य उसके प्रति होते हैं।

और उस रात जब हम लोग गाड़ी पर चढ़े तो साथ मे रीमों कागज था। मुक्तिबोध ने  हठ करके पूरी ​कविताएं,अधूरी कविताएं,तैयार पाण्डुलिपियां बस लदवा लीं। बोले, “यह सब मेरे साथ जाएगा। एकाध हफ्ते बाद मैं कुछ काम करने लायक हो जाउंगातो कविताएं पूरी करूंगा,नई लिखूंगा। और पाण्डुलिपियां दुरूस्त करूंगा। अपने से अस्पताल में बेकार पड़ा नहीं रहा जाएगा,पार्टनर!.....और हां,वह पासबुक रख ली है ?

पर उन कागजों पर मुक्तिबोध का न फिर हाथ चल सका और न वे एक चेक काट सके।

जिन्दगी बिना कविता-संग्रह देखे और बिना चेक काटे गुजर गई।

26 September, 2011

मैं उनका ही होता

मैं उनका ही होता, जिनसे
          मैंने रूप-भाव पाए हैं.
वे मेरे ही हिये बंधे हैं
         जो मर्यादाएं लाए हैं.
मेरे शब्द, भाव उनके हैं,
        मेरे पैर और पथ मेरा,
        मेरे अंत और अथ मेरा,
               ऐसे किन्तु चाव उनके हैं.
मैं ऊँचा होता चलता हूँ
        उनके ओछेपन से गिर-गिर
        उनके छिछलेपन से खुद-खुद
                  मैं गहरा होता चलता हूँ

  

01 July, 2011

पूंजीवादी समाज के प्रति

इतने प्राण, इतने हाथ, इतनी बुद्धि
इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि
इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति
यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति
इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद –
जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध
इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंध
तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध
तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध
तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र
तेरे ह्रास में भी रोग-कृमि हैं उग्र
तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।
मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक
अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक
तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।

28 December, 2010

जब प्रश्न चिन्ह बौखला उठे थे

जीवन के प्रखर समर्थक-से जब प्रश्न चिन्ह
बौखला उठे थे दुर्निवार,
तब एक समंदर के भीतर
रवि की उद्भासित छवियों का
गहरा निखार
स्वर्णिम लहरों सा झल्लाता
झलमला उठा;
मानो भीतर के सौ-सौ अंगारी उत्तर
सब एक साथ
बौखला उठे
तमतमा उठे !!

संघर्ष विचारों का लोहू
पीड़ित विवेक की शिरा-शिरा
में उठा गिरा,
मस्तिष्क तंतुओं में प्रदीप्त
वेदना यथार्थों की जागी !!

मेरे सुख-दुख ने अकस्मात् भावुकतावश
सुख-दुख के चरणों की
मन ही मन
यों की 'पालागी' —
कण्ठ में ज्ञान संवेदन के,
आंसू का कांटा फंसा और
मन में यह आसमान छाया,
जिस में जन-जन के घर-आंगन
का सूरज भासमान छाया
झुरमुर-झुरमुर वह नीम हँसा,
चिड़िया डोली,
फर-फर आंचल तुमको निहार
मानो कि मातृ-भाषा बोली —
जिनसे गूंजा घर-आंगन
खनके मानों बहुओं की चूड़ी के कंगन ।
मैं जिस दुनिया में आज बसा,
जन-संघर्षों की राहों पर
ज्वालाओं से
माँओं का बहनों का सुहाग सिन्दूर हँसा बरसा-बरसा ।

इन भारतीय गृहिणी-निर्झरिणी-नदियों के
घर-घर के भूखे प्राण हँसे ।
दिल के आंसू के फव्वारे
लेकिन यह मेरे छन्द
बावरे बुरी तरह यों अकुलाकर,
बूढ़े पितृश्री के चरणों में लोट-पोटकर,
ऐसी पावन धूल हुए —
बहना के हिय की तुलसी पर
घन छाया कर
मंजरी हुए,
भाई के दिल में फूल हुए ।

अपने समुंदरों के विभोर
मस्ती के शब्दों में गम्भीर
तब मेरा हिन्दुस्तान हँसा ।
जन-संघर्षों की राहों पर
आंगन के नीमों ने मंजरियाँ बरसायीं ।
अम्बर में चमक रही बहन-बिजली ने भी
थी ताकत हिय में सरसायी ।
घर-घर के सजल अंधेरे से
मेघों ने कुछ उपदेश लिए,
जीवन की नसीहतें पायीं ।
जन-संघर्षों की राहों पर
गम्भीर घटाओं ने
युग जीवन सरसाया ।

आंसू से भरा हुआ चुम्बन मुझपर बरसाया ।
ज़िंदगी नशा बन घुमड़ी है
ज़िंदगी नशे सी छायी है
नव-वधुका बन
यह बुद्धिमती
ऐसी तेरे घर आई है ।

रे, स्वयं अगरबत्ती से जल,
सुगंध फैला
जिन लोगों ने
अपने अंतर में घिरे हुए
गहरी ममता के अगुरू-धूम
के बादल सी
मुझको अथाह मस्ती प्रदान की
वह हुलसी, वह अकुलायी
इस हृदय-दान की वेला में मेरे भीतर ।
जिनके स्वभाव के गंगाजल ने,
युगों-युगों को तारा है,
जिनके कारण यह हिन्दुस्तान हमारा है,
कल्याण व्यथाओं मे घुलकर
जिन लाखों हाथों-पैरों ने यह दुनिया
पार लगायी है,
जिनके कि पूत-पावन चरणों में
हुलसे मन —
से किये निछावर जा सकते
सौ-सौ जीवन,
उन जन-जन का दुर्दान्त रुधिर
मेरे भीतर, मेरे भीतर ।
उनकी बाहों को अपने उर पर
धारण कर वरमाला-सी
उनकी हिम्मत, उनका धीरज,
उनकी ताकत
पायी मैंने अपने भीतर ।
कल्याणमयी करुणाओं के
वे सौ-सौ जीवन-चित्र लिखे
मेरे हिय में जाने किसने, जाने कैसे
उनकी उस सहजोत्सर्गमयी
आत्मा के कोमल पंख फँसे
मेरे हिय में,
मँडराता है मेरा जी चारों ओर सदा
उनके ही तो ।
यादें उनकी
कैसी-कैसी बातें लेकर,
जीवन के जाने कितने ही रुधिराक्त प्राण
दुःखान्त साँझ
दुर्दान्त भव्य रातें लेकर
यादें उनकी
मेरे मन में
ऐसी घुमड़ीं
ऐसी घुमड़ीं
मानो कि गीत के
किसी विलम्बित सुर में —
उनके घर आने की
बेर-अबेर खिली,
क्रान्ति की मुस्कराती आँखों —
पर, लहराती अलकों में बिंध,
आंगन की लाल कन्हेर खिली ।
भूखे चूल्हे के भोले अंगारों में रम,
जनपथ पर मरे शहीदों के
अन्तिम शब्दों बिलम-बिलम,
लेखक की दुर्दम कलम चली ।

दुबली चम्पा
जन संघर्षों में
गदरायी,
खण्डर-मकान में फूल खिले, तल में बिखरे
जीवन संघर्षों में घुमड़े
उमड़े चक्की के गीतों में
कल्याणमयी करुणाओं के
हिन्दुस्तानी सपने निखरे —
जिस सुर को सुन
कूएँ की सजल मुँडेर हिली
प्रातः कालीन हवाओं में ।
सूरज का लाल-लाल चेहरा
डोला धरती की बाहों में,
आसक्ति भरा रवि का मुख वह ।
उसकी मेधाओं की ज्वालाएँ ऐसी फैलीं —
उस घास-भरे जंगल-पहाड़-बंजर में
यों दावाग्नि लगी
मानो बूढ़ी दुनिया के सिर पर आग लगी
सिर जलता है, कन्धे जलते ।

यह अग्नि-विश्वजित् फैली है जिन लोगों की
रे नौजवान,
इतिहास बनानेवाला सिर करके ऊंचा
भौहों पर मेघों-जैसा
विद्युत भार
विचारों का लेकर
पृथ्वी की गति के साथ-साथ घूमते हुए
वे दिशा-काल वन वातावरण-पटल जैसे
चलते जन-जन के साथ
वे हैं आगे वे हैं पीछे ।

अगजाजी खोहों और खदानों के
तल में
ज्यों रत्न-द्वीप जलते
त्यों जन-जन के अनपहचाने अन्तस्तल में
जीवन के सत्य-दीप पलते !!

दावाग्नि-लगे, जंगल के बीचों-बीच बहे
मानो जीवन सरिता
जलते कूलोंवाली,
इस कष्ट भरे जीवन के विस्तारों में त्यों
बहती है तरुणों की आत्मा प्रतिभाशाली
अपने भीतर प्रतिबिम्बित जीवन-चित्रावलि,
लेकर ज्यों बहते रहते हैं,
ये भारतीय नूतन झरने
अंगारों की धाराओं से
विक्षोभों के उद्वेगों में
संघर्षों के उत्साहों में
जाने क्या-क्या सहते रहते ।
लहरों की ग्रीवा में सूरज की वरमाला;
जमकर पत्थर बन गए दुखों-सी
धरती की प्रस्तर-माला
जल-भरे पारदर्शी उर में !!
सम्पूरन मानव की पीड़ित छवियाँ लेकर
जन-जन के पुत्रों के हिय में
मचले हिन्दुस्तानी झरने
मानव युग के ।

इन झरनों की बलखाती धारा के जल में —
लहरों में लहराती धरती
की बाहों ने
बिम्बित रवि-रंजित नभ को कसकर चूम लिया,
मानव-भविष्य का विजयाकांक्षी आसमान
इन झरनों में
अपने संघर्षी वर्तमान में घूम लिया !!

ऐसा संघर्षी वर्तमान —
तुम भी तो हो,
मानव-भविष्य का आसमान —
तुममें भी है,
मानव-दिगन्त के कूलों पर
जिन लक्ष्य अभिप्रायों की दमक रही किरनें
वे अपनी लाल बुनावट में
जिन कुसुमों की आकृति बुनने
के लिए विकल हो उठती हैं —
उसमें से एक फूल है रे, तुम जैसा हो,
वह तुम ही हो.
इस रिश्ते से, इस नाते से
यह भारतीय आकाश और पृथ्वीतल,
बंजर ज़मीन के खण्डहर के बरगद-पीपल
ये गलियाँ, राहें घर-मंजिल,
पत्थर, जंगल
पहचानते रहे नित तुमको जिन आँखों से
उन आँखों से मैंने भी तुमको पहचाना,
मानव-दिगन्त के कूलों पर
जिन किरनों का ताना-बाना
उस रश्मि-रेशमी
क्षितिज-क्षोभ पर अंकित
नतन-व्यक्तित्वों के सहस्र-दल स्वर्णोज्ज्वल —
आदर्श बिम्ब मानव युग के ।
उनके आलोक-वलय में जग मैंने देखा —
जन-जन के संघर्षों में विकसित
परिणत होते नूतन मन का ।
वह अन्तस्तल . . . . . .
संघर्ष-विवेकों की प्रतिभा
अनुभव-गरिमाओं की आभा
वह क्षमा-दया-करुणा की नीरोज्ज्वल शोभा
सौ सहानुभूतियों की गरमी,
प्राणों में कोई बैठा है कबीर मर्मी
ये पहलू-पांखें, पंखुरियाँ स्वर्णोज्जवल
नूतन नैतिकता का सहस्र-दल खिलता है,
मानव-व्यक्तित्व-सरोवर में !!
उस स्वर्ण-सरोवर का जल
चमक रहा देखो
उस दूर क्षितिज-रेखा पर वह झिलमिला रहा ।

ताना-बाना
मानव दिगंत किरनों का
मैंने तुममें, जन-जन में जिस दिन पहचाना
उस दिन, उस क्षण
नीले नभ का सूरज हँसते-हँसते उतरा
मेरे आंगन,
प्रतिपल अधिकाधिक उज्ज्वल हो
मधुशील चन्द्र
था प्रस्तुत यों
मेरे सम्मुख आया मानो
मेरा ही मन ।
वे कहने लगे कि चले आ रहे तारागण
इस बैठक में, इस कमरे में, इस आंगन में —
जब कह ही रहा था कि कब इन्हें बुलाया है मैंने,
तब अकस्मात् आये मेरे जन, मित्र, स्नेह के सम्बन्धन
नक्षत्र-मंडलों में से तारागण उतरे
मैदान, धूप, झरने, नदियाँ सम्मुख आयीं,
मानो जन-जन के जीवन-गुण के रंगों में
है फैल चली मेरी दुनिया की
या कि तुम्हारी ही झाँईं ।
तुम क्या जानो मुझको कितना
अभिमान हुआ
सन्दर्भ हटा, व्यक्ति का कहीं उल्लेख न कर,
जब भव्य तुम्हारा संवेदन
सबके सम्मुख रख सका, तभी
अनुभवी ज्ञान-संवेदन की दुर्दम पीड़ा
झलमला उठी !!

ईमानदार संस्कार-मयी
सन्तुलित नयी गहरी चेतना
अभय होकर अपने
वास्तविक मूलगामी निष्कर्षों तक पहुँची
ऐसे निष्कर्ष कि जिनके अनुभव-अस्त्रों से
वैज्ञानिक मानव-शस्त्रों से

मेरे सहचर हैं ढहा रहे
वीरान विरोधी दुर्गों की अखण्ड सत्ता ।
उनके अभ्यन्तर के प्रकाश की कीर्तिकथा
जब मेरे भीतर मंडरायी
मेरी अखबार-नवीसी ने सौ-सौ आंखें पायीं ।
कागज़ की भूरी छाती पर
नीली स्याही के अक्षर में था प्रकट हुआ
छप्पर के छेदों से सहसा झाँका वह नीला आसमान
वह आसमान जिसमें ज्योतिर्मय
कमल खिला
रवि का ।

शब्दों-शब्दों में वाक्यों में
मानवी-अभिप्रायों का सूरज निकला
उसकी विश्वाकुल एक किरन
तुम भी तो हो,
धरती के जी को अकुलानेवाली
छवि-मधुरा कविता की
प्यारी-प्यारी सी एक कहन
तुम भी तो हो,
वीरान में टूटे विशाल पुल के एक खण्डहर में
उगे आक के फूलों के नीले तारे,
मधु-गन्ध भरी उद्दाम हरी
चम्पा के साथ
उगे प्यारे,
मानो जहरीले अनुभव में
मानव-भावों के अमृतमय
शत-प्रतिभाओं के अंगारे,
उनकी दुर्दान्त पराकाष्ठा
की एक किरन
तुम भी तो हो !!

अपने संघर्षों के कडुए
अनुभव की
छाती के भीतर
दुर्दान्त ऐतिहासिक दर्दों की भँवर लिये
तुम-जैसे-जन
मेरे जीवन निर्झर के पथरीले तट पर
आ खड़े हुए,
तब मैंने नहीं पुकारा — 'तुम आ जाओ'
तब मैंने नहीं कहा था यों
मेरे मन की जल धारा में
तुम हाथ डुबो,
मुँह धो लो, जल पी लो, अपना
मुख बिम्ब निहारो तुम ।
जब मेरे मन की पथरीली
निर्झर धारा के फूलों पर,
गहरी धनिष्ठता की असीम
गम्भीर घटाएँ घुमड़ी थीं,
गम्भीर मेघ-दल उमड़े थे,
औ' जीवन की सीधी सुगन्ध
जब महकी थी
ईमाम-भरे-बेछोर सरल मैदानों पर
तब क्यों सहसा
तूफानी मेघों के हिय में
तुम विद्युत की दुर्दान्त व्यथा-सी
डोली थीं,
तब मैंने कहा था अपनी आँखों में
भावातिरेक तुम दरसाओ ।
जब आसमान से धरती तक
आकस्मिक एक प्रकाश-बेल
विद्युत की नील विलोल लता-सी
सहसा तुम बेपर्द हुईं
जब मेरे-मन-निर्झर-तट पर
तब मैंने नहीं कहा थी मुझको इस प्रकार
तुम अपना अंतर का प्राकार बना जाओ ।
लेकिन संघर्षों के पथ पर
ऐसे अवसर आते ही हैं,
ऐसे सहचर मिलते ही हैं,
नभ-मण्डल में खुद को उद्घाटित
करता चलता है सूरज
इस प्रकार,
जीवन के प्रखर-समर्थक से प्रश्न-चिन्ह
बौखला रहे हों दुर्निवार !!

कोई स्वर ऊँचा उठता हुआ बींधता चला गया ।
उस स्वर को चमचमाती-सी एक तेज़ नोक
जिसने मेरे भीतर की चट्टानी ज़मीन
अपनी विद्युत से यों खो दी, इतनी रन्ध्रिल कर दी कि अरे
उस अन्धकार भूमि से अजब
सौ लाल-लाल जाज्ज्वल्यमान
मणिगण निकले
केवल पल में
देदीप्यमान अंगार हृदय में संभालता हुआ
उठता हूँ
इतने में ही जाने कितनी गहराई में से मैंने देखा
गलियों के श्यामल सूने में
कोई दुबली बालक छाया
असहाय ! रोती चली गयी !!

दुनिया के खड़े डूह दीखे
वीरान चिलचिलाहट में फटे चीथ चमके
थे छोर गरीब साड़ियों के
नन्हे बुरकों की बाहें भीतर फँसी झाड़ियों
उन्हें देखता रहा कि इतने में
ढूहों में से झाड़ी में से ही उधर निकली
वीरान हवा की लहरों पर
पीली-धुंधली उदास गहरी नारी-रेखा
उसकी उंगली पकड़ चलती कोई
बालक-झाईं मैंने देखी
वीरान हवा की लहरों पर
पैरों पर मैं चंचलतर हूँ
जब इसी गली के नुक्कड़ पर
मैंने देखी
वह फक्कड़ भूख उदास प्यास
निःस्वार्थ तृषा
जीने-मरने की तैयारी
मैं गया भूख के घर व प्यास के आँगन में
चिन्ता की काली कुठरी में,
तब मुझे दिखे कार्यरत वहाँ
विज्ञान-ज्ञान
नित सक्रिय हैं
सब विश्लेषण संस्लेषण में
मुझ में बिजली की घूम गई थरथरी
उद्दाम ज्ञान संवेदन की फुरफुरी
हृदय में जगी
तन-मन में कोई जादू की-सी आग लगी
मस्तिष्क तन्तुओं में से प्रदीप्त
वेदना यथार्थों की जागी
यद्यपि दिन है
सब ओर लगाते आग विद्युत क्षण हैं
किन्तु अंधेरे में —
अपनी उठती-गिरती लौ की लीलाओं में
अपनी छायाओं की लीला देखता रहा
अन्तर आपद्-ग्रस्ता आत्मा
नमकीन धूल के गरम-गरम अनिवार बवण्डर सी घूमी
फिर छितर गयी
या बिखर गयी
पर अजब हुआ
कुछ मटियाले पैरों के उसने पैर छुए
अद्विग्न मनःस्थिति में
जीवन के रज धूसर पद पर
आँखें बन कर, वह बैठ गयी, भीतरी परिस्थिति में ।
मस्तिष्क तन्तुओं में प्रदीप्त वेदना यथार्थों की जागी
वह सड़क बीच
हर राहगीर की छाँह तले
उसका सब कुछ जीने पी लेने को उतावली
यह सोच कि जाने कौन वेष में कहाँ व कितना सच मिले —
वह नत होकर उन्नत होने की बेचैनी !

12 August, 2010

मुझे पुकारती हुई पुकार

मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीँ...
प्रलम्बिता अंगार रेख-सा खिंचा
अपार चर्म
वक्ष प्राण का
पुकार खो गई कहीं बिखेर अस्थि के समूह
जीवनानुभूति की गभीर भूमि में।
अपुष्प-पत्र, वक्र-श्याम झाड़-झंखड़ों-घिरे असंख्य ढूह
भग्न निश्चयों-रुंधे विचार-स्पप्न-भाव के
मुझे दिखे
अपूर्त सत्य की क्षुधित
अपूर्ण यत्न की तृषित
अपूर्त जीवनानुभूति-प्राणमूर्ति की समस्त भग्नता दिखी
(कराह भर उठा प्रसार प्राण का अजब)
समस्त भग्नता दिखी
कि ज्यों विरक्त प्रान्त में
उदास-से किसी नगर
सटर-पटर
मलीन, त्यक्त, ज़ंग-लगे कठोर ढेर--
भग्न वस्तु के समूह
चिलचिल रहे प्रचण्ड धूप में उजाड़...
दिख गए कठोर स्याह
(घोर धूप में) पहाड़
कठिन-सत्त्व भावना नपुंसका असंज्ञ के
मुझे दिखी विराट् शून्यता अशान्त काँपती
कि इस उजाड़ प्रान्त के प्रसार में रही चमक।
रहा चमक प्रसार...
फाड़ श्याम-मृत्तिका-स्तरावरण उठे सकोण
प्रस्तरी प्रतप्त अंग यत्र-तत्र-सर्वतः
कि ज्यों ढँकी वसुन्धरा-शरीर की समस्त अस्थियाँ खुलीं
रहीं चमक कि चिलचिला रही वहाँ
अचेत सूर्य की सफ़ेद औ' उजाड़ धूप में।
समीरहीन ख़ैबरी
अशान्त घाटियों गई असंग राह
शुष्क पार्वतीय भूमि के उतार औ' उठान की निरर्थ
उच्चता निहारती चली वितृष्ण दृष्टि से
(कि व्यर्थ उच्चता बधिर असंज्ञ यह)
उजाड़ विश्व की कि प्राण की
इसी उदास भूमि में अचक जगा
मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं।

दरार पड़ गई तुरत गभीर-दीर्घ
प्राण की गहन धरा प्रतप्त के
अनीर श्याम मृत्तिका शरीर में।
कि भाव स्वप्न-भार में
पुकार के अधीर व्यग्र स्पर्श से बिलख उठे
तिमिर-विविर में पड़ी अशान्त नागिनी--
छिपी हुई तृषा
अपूर्त स्वप्न-लालसा
तुरत दिखी
कि भूल-चूक धवंसिनी अवावृता हुई।
पुकार ने समस्त खोल दी छिपी प्रवंचना
कहा कि शुष्क है अथाह यह कुआँ
कि अन्धकार-अन्तराल में लगे
महीन श्याम जाल
घृण्य कीट जो कि जोड़ते दीवाल को दीवाल से
व अन्तराल को तला
अमानवी कठोर ईंट-पत्थरों से भरा हुआ
न नीर है, न पीर है, मलीन है
सदा विशून्य शुष्क ही कुआँ रहा।

विराट् झूठ के अनन्त छन्द-सी
भयावनी अशान्त पीत धुन्ध-सी
सदा अगेय
गोपनीय द्वन्द्व-सी असंग जो अपूर्त स्वप्न-लालसा
प्रवेग में उड़े सुतिक्ष्ण बाण पर
अलक्ष्य भार-सी वृथा
जगा रही विरूप चित्र हार का
सधे हुए निजत्व की अभद्र रौद्र हार-सी।
मैं उदास हाथ में
हार की प्रत्प्त रेत मल रहा
निहारता हुआ प्रचण्ड उष्ण गोल दूर के क्षितिज।

शून्य कक्ष की उदास
श्वासहीन, पीत-वायु शान्ति में
दिवाल पर
सचेष्ट छिपकली
अजान शब्द-शब्द ज्यों करे
कि यों अपार भाव स्वप्न-भार ये
प्रशान्ति गाढ़ में
प्रशान्ति गाढ़ से
प्रगाढ़ हो
समस्त प्राण की कथा बखानते
अधीर यन्त्र-वेग से अजीब एकरूप-तान
शब्द, शब्द, शब्द में।

मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं...
आज भी नवीन प्रेरणा यहाँ न मर सकी,
न जी सकी, परन्तु वह न डर सकी।
घनान्धकार के कठोर वक्ष
दंश-चिह्न-से
गभीर लाल बिम्ब प्राण-ज्योति के
गभीर लाल इन्दु-से
सगर्व भीम शान्ति में उठे अयास मुसकरा
घनान्धकार के भुजंग-बन्ध दीर्घ साँवरे
विनष्ट हो गए
प्रबुद्ध ज्वाल में हताश हो।
विशाल भव्य वक्ष से
बही अनन्त स्नेह की महान् कृतिमयी व्यथा
बही अशान्त प्राण से महान् मानवी कथा।
किसी उजाड़ प्रान्त के
विशाल रिक्त-गर्भ गुम्बजों-घिरे
विहंग जो
अधीर पंख फड़फड़ा दिवाल पर
सहायहीन, बद्ध-देह, बद्ध-प्राण
हारकर न हारते
अरे, नवीन मार्ग पा खुला हुआ
तुरन्त उड़ गए सुनील व्योम में अधीर हो।
मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई वहीं
सँवारती हुई मुझे
उठी सहास प्रेरणा।
प्रभात भैरवी जगी अभी-अभी।