08 August, 2009

अँधेरे में - 1

जिन्दगी के ...
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;
आवाज़ पैरों की देती है सुनाई
बार-बार ... बार-बार ,
वह नहीं दिखता ..... नहीं ही दिखता
किन्तु, वह रहा घूम
तिलिस्मी खोह में गिरफ्तार कोई एक ;
भीत- पार आती पास से,
गहन रहस्यमय अंधकार - ध्वनी- सा
अस्तित्व जनाता
अनिवार एक
और, मेरे ह्रदय की धक् धक्
पूछती है- वह कौन
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई !
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीत से
फूले हुए पलस्तर,
खिरती है चूनेभरी रेत
खिसकती हैं पपरियाँ इस तरह -
खुद--खुद
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है ,
स्वयमपि
मुख बन जाता है दिवाल पर ,
नुकीली नाक है और
भव्य ललाट है
दृढ हनु;
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति
कौन वह दिखाई जो देता ,पर नही जाना जाता है !!
कौन मनु ?

बाहर शहर के पहाड़ी के उस पार, तालाब ...
सब तरफ अँधेरा,
प्रशांत जल,
पर, भीतर से उभरती है सहसा
सलिल के तम्- श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति
कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फ़ैल जाता है
और मुस्काता है ,
पहचान बताता है ;
किन्तु, मैं हतप्रभ
नहीं वह समझ में आता

अरे ! अरे !
तालाब के आस पास, अँधेरे में वन वृक्ष
चमक चमक उठाते हैं हरे हरे, अचानक
वृक्षो के शीश पर नाच नाच उठती हैं बिजलियाँ,
शाखाएँ, डालियाँ झूमकर झपटकर
चीख़, एक - दुसरे पर पटकती है सर की अकस्मात्
वृक्षों के अँधेरे में छिपी हुयी किसी एक
तिलिस्मी खोह का शिला-द्वार
खुलता है धड़ से
...............
घुसती है लाल-लाल मशाल अजीब-सी,
अन्तराल-विवर के तम् में
लाल-लाल कुहरा;
कुहरे में, सामने, रक्तालोक स्नात-पुरुष एक,
रस्यमय साक्षात् !!
तेजोप्रभावमय उसका ललाट देख ,
मेरे अंग-अंग में अजीब एक थर-थर
गौरवर्ण, दीप्त-दृग, सौम्यमुख
संभावित स्नेह-सा प्रिय रूप देखकर
विलक्षण शंका,
भव्य आजानुभुज देखते ही साक्षात्
गहन एक संदेह

वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है,
पूर्ण अवस्था वह
निज-संभावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिभाओं की
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव,
ह्रदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,
आत्मा की प्रतिमा

किंतुं वह फटे हुए वस्त्र क्यों पहने है ?
उसका स्वर्ण-वर्ण मुख मैला क्यों ?
वक्ष पर इतना बड़ा घाव कैसे हो गया ?
उसने कारावास- दुःख झेला क्यों ?
उसकी इतनी भयानक स्थिति क्यों है ?
रोटी उसे कौन पहुचता है ?
कौन पानी देता है ?
फिर भी, उसके मुख पर स्मित क्यों है ?
प्रचंड शक्तिमान क्यों दिखई देता है ?

प्रश्न थे गंभीर, शायद खतरनाक भी,
इसीलिए बहार के गुंजान
जंगलो से आती हुई हवा ने
फूंक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी .....
कि मुझको यूँ अँधेरे में पकड़कर
मौत कि सजा दी !
किसी काले 'डैश' की घनी काली पट्टी ही
आँखों पर बंध गई,
किसी खड़ी पाई कि सूली पर मैं टांग दिया गया,
किसी शुन्य बिंदु के अंधियारे खड्डे में
गिरा दिया गया मैं
अचेतन स्थिति में !

3 comments:

  1. ब्लॉग की दुनिया के "अंधेरे में" 'मुक्तिबोध'का स्वागत है। ब्लॉग-जगत को रौशन करने की कोशिश कर रहे कुछ लोगों के साथ, आशा है, मुक्तिबोध इन अंधेरों को जीत लेगा।
    बहुत बहुत बधाई रंगनाथ भाई। मेरी प्रिय कविताओं में से एक से ब्लॉग की शुरुआत करने के लिए धन्यवाद।
    'मुक्तिबोध'की सफलता और बौद्धिक लोकप्रियता की कामना के साथ,
    पुरुषोत्तम नवीन

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  2. ब्लॉग पर आने का शुक्रिया ......!!

    'अँधेरे में ' मेरी पहले भी पढ़ी कविता है ....आज आपके ब्लॉग पे पढ़ते वक़्त एम. ए. की कुछ यादें ताजा हो आयीं ......!!

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