06 August, 2009

अँधेरे में - 3

समझ न पाया कि चल रहा स्वप्न या
जागृति शुरू है
दिया जल रहा है,
पीतालोक-प्रसार में काल गल रहा है,
आस-पास फैली हुई जग-आकृतियाँ
लगती हैं छपी हुई जड़-चित्र-कृतियों- सी
अलग व दूर-दूर
निर्जीव !! ,
यह सिविल लाइंस है. मैं अपने कमरे में
यहाँ पड़ा हुआ हूँ.
आँखें खुली हुईं हैं,
पीटे गए बालक-सा मार खाया चेहरा
उदास इकहरा,
सलेट-पट्टी पर खिंची गयी तसवीर,
भूत जैसी आकृति -
क्या वह मैं हूँ ?
मैं हूँ ?

रात के दो हैं,
दूर दूर जंगल में सियारों का हो-हो,
पास-पास आती हुई घहराती गूँजती
किसी रेलगाड़ी के पहियों की आवाज़ !!
किसी अनपेक्षित
असंभव घटना का भयानक संदेह,
अचेतन प्रतीक्षा,
कहीं कोई रेल एक्सीडेंट न हो जाए.
चिंता के गणित अंक
आसमानी सलेट-पट्टी पर चमकते
खिड़की से दिखते.

हाय ! हाय ! तोल्स्तोय
कैसे मुझे दीख गए
सितारों के बीच-बीच
घुमते व रूकते
पृथ्वी को देखते.

शायद तोल्स्तोय-नुमा
कोई वह आदमी
और है,
मेरे किसी भीतर धागे का आख़िरी छोर वह,
अनलिखे मेरे उपन्यास का
केन्द्रीय संवेदन
दबी हाय-हाय-नुमा,
शायद, तोल्स्तोय-नुमा.
प्रोसेशन ?
निस्तब्ध नगर के मध्य-रात्रि अँधेरे में सुनसान
किसी दूर बैंड की दबी हुई क्रमागत तान-धुन,
मंद-तार उच्च-निम्न स्वर-स्वन
उदास-उदास ध्वनी-तरंगे हैं गंभीर,
दीर्घ लहरियाँ !!

गैलरी में जाता हूँ, देखता हूँ रास्ता
वह कोलतार-पथ अथवा
मरी हुई खिंची हुई कोई काली जिह्वा
बिजली के द्युतिमान दिये या
मरे हुए दाँतो का चमकदार नमूना !!

किन्तु, दूर सड़क के उस छोर
शीत भरे थर्राते तारों के अंधियाले तल में
नील तेज-उद् भास
पास-पास पास-पास
आ रहा इस ओर !
दबी हुई गंभीर स्वर-स्वन तरंगे,
उदास तान-धुन शत-ध्वनी-संगम-संगीत
समीप आ रहा !!

और अब
गैसलाइट पांतों की बिन्दुएँ छिटकीं
बीचोंबीच उनके
सांवले जुलूस-सा क्या-कुछ दीखता !!
और अब
गैसलाइट-नीलाई में रँगे हुए अपार्थिव चहरे,
बैंड-दल
उनके पीछे काले-काले बलवान घोड़ों का जत्था
दीखता,
घना व डरावना अवचेतन ही
जुलूस में चलता
क्या शोभा यात्रा
किसी मृत्यु दल की ?
अजीब !!
दोनों ओर, नीली गैसलाइट-पाँत
चल रही,चल रही
नींद में खोये हुए शहर की गहन अवचेतना में
हलचल ( पाताली तल में
चमकदार सांपों की उड़ती हुई लगातार
लकीरों की वारदात !!
सब सोए हुए हैं.
लेकीन, मैं जाग रहा, देख रहा
रोमांचकारी यह जादुई करामात !!)

विचित्र प्रोसेशन
गंभीर क्विक मार्च…..
कलाबत्तुवाली काली ज़रीदार ड्रेस पहने
चमकदार बैंड-दल-
अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप, उदर-आकृति
आंतों के जालों से उलझे हुए, बाजे वे दमकते हैं भयंकर
गंभीर गीत स्वन-तरंगे
ध्वनियों के आवर्त मंडराते पथ पर.
बैंड के लोगों के चेहरे
मिलते हैं मेरे देखे हुओं से,
लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार
इसी नगर के !!
बड़े-बड़े नाम अरे, कैसे शामिल हो गये इस बैंड-दल में !!
उनके पीछे चल रहा
संगीन-नोकों का चमकता जंगल,
चल रही पदचाप, तालबद्ध दीर्घ पाँत
टैंक-दल, मोर्टार, आर्टिलरी, सन्नद्ध,
धीरे-धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावना,
सैनिकों के पथराये हुए चेहरे
चिढ़े हुए, झुलसे हुए, बिगड़े हुए गहरे !
शायद, मैंने उन्हें पहले कहीं तो भी देखा.
शायद, उनमे मेरे कई परिचित !!
उनके पीछे यह क्या !!
कैवलरी !!
काले-काले घोड़ों पर खाकी मिलिट्री ड्रेस,
चेहरे का आधा भाग सिंदूरी -गेरुआ
आधा भाग कोलतारी भैरव,
भयानक !!
हाथों में चमचमाती सीधी खड़ी तलवार
आबदार !!
कंधे से कमर तक कारतूसी बैल्ट है तिरछा.
कमर में, चमड़े के कवर में पिस्तौल,
रोषभरी एकाग्र दृष्टि में धार है,
कर्नल, ब्रिगेडियर,जनरल, मार्शल
कई और सेनापति सेनाध्यक्ष
चेहरे वे मेरे जाने-बूझे-से लगते,
उनके चित्र समाचार-पत्रों में छपे थे
उनके लेख देखे थे,
यहाँ तक कि कवितायें पढ़ी थीं,
भई वाह !
उनमे कई प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण
मंत्री भी, उद्योगपति और विद्वान्
यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात
डोमाजी उस्ताद
बनता है बलबन
हाय हाय !!
यहाँ ये दीखते हैं भूत-पिशाच-काय.
भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब
साफ़ उभर आया है
छुपे हुए उद्देश्य
यहाँ निखर आए हैं,
यहाँ शोभा-यात्रा है किसी मृत्यु दल की

( विचारों की फिरकी
सिर में है घुमती )

इतने में प्रोसेशन में से कुछ मेरी और
आँखें उठीं रोषभर,
ह्रदय में मानो कि संगीन-नोंके ही घुस पड़ी बर्बर,
सड़क पर उठ खडा हो गया कोई शोर-
"मारो गोली, दागो स्साले को एकदम
दुनिया कि नज़रों से हटकर
छुपे तरीके से
हम जा रहे थे कि
आधी रात अँधेरे में उसने
देख लिया हमको
व जान गया वह सब
मार डालो, उसको ख़त्म करो एकदम !!"
रास्ते पर भाग-दौड़ धका-पेल !!
गैलरी से भागा मैं पसीने से सारोबार !!
एकाएक टूट गया स्वप्न व छिन्न-भिन्न
हो गए सब चित्र.

जागते में फिर से याद आने लगा वह स्वप्न,
फिर से याद आने लगे अँधेरे में चेहरे,
और, तब मुझे प्रतीत हुआ भयानक
गहन मृतात्माएं इसी नगर की
हर रात जुलूस में चलतीं,
परन्तुं, दिन में
बैठती हैं मिलकर करती हुई षडयंत्र
विभिन्न दफ्तरों-कार्यालयों, केन्द्रों में, घरों में.
हाय, हाय ! मैंने उन्हें देख लिया नंगा,
इसकी मुझे और सजा मिलेगी.

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