30 May, 2009

विचार आते हैं

विचार आते हैं
लिखते समय नहीं
बोझ ढोते वक़्त पीठ पर
सिर पर उठाते समय भार
परिश्रम करते समय
चांद उगता है व
पानी में झलमलाने लगता है
हृदय के पानी में
विचार आते हैं
लिखते समय नहीं
...पत्थर ढोते वक़्त
पीठ पर उठाते वक़्त बोझ
साँप मारते समय पिछवाड़े
बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त
पत्थर पहाड़ बन जाते हैं
नक्शे बनते हैं भौगोलिक
पीठ कच्छप बन जाती है
समय पृथ्वी बन जाता है...

2 comments:

  1. "muktibodh" par mera pehla vsit hai. ise dekhta rahoonga ab. yeh kavita pehle nahi padhi....bahut sundar hai.

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  2. कमाल की कविता है ....पढी हुई है लेकिन उनकी हर कविता हर बार नयी लगती है !

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