07 August, 2009

अँधेरे में - 2

सूनापन सिहरा ,
अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले उभरे ,
शुन्य के मुख पर सलवटें स्वर की,
मेरे ही उर पर ,धँसती हुई सिर,
छटपटा रही हैं शब्दों की लहरें
मीठी हैं दुःसह !!
अरे, हाँ सांकल ही रह-रह
बजती है द्वार पर
कोई मेरी बात मुझे बताने के लिए ही
बुलाता है , बुलाता है ( ह्रदय को सहला
मानो किसी जटिल प्रसंग में सहसा
होंठो पर होंठ रख , कोई सच-सच बात
सीधे-सीधे कहने को तड़प जाए मेरा जी ...
इस तरह, सांकल ही रह-रह, बजती है द्वार पर )

आधी रात, इतने अँधेरे में कौन आया मिलने ?
विमान प्रतीक्षातुर कुहरे में घिरा हुआ
द्युतिमय मुख - वह प्रेमभरा चेहरा -
भोला-भाला भाव-
पहचानता हूँ बाहर जो खड़ा है !!
यह वही व्यक्ति है, जी हाँ !
जो मुझे तिलिस्मी खोह में दिखा था
अवसर - अनवसर
प्रकट जो होता ही रहता,
मेरी सुविधावों का न तनिक ख्याल कर
चाहे जहाँ, चाहे जिस समय उपस्थित,
चाहे जिस रूप में चाहें जिन प्रतीकों में प्रस्तुत ;
इशारे से बताता है, समझाता रहता ,
ह्रदय को देता है बिजली के झटके !!
अरे, उसके चहरे पर खिलती है हैं सुबहें ,
गलों पर चट्टानी चमक पठार की
आँखों में किरनीली शांति की लहरें ,
उसे देख, प्यार उमड़ता है अनायास !
लगता है - दरवाजा खोलकर
बाँहों में कस लूँ
ह्रदय में रख लूँ
घुल जाऊँ, मिल जाऊँ लिपटकर उससे
परन्तु, भयानक खड्डे के अँधेरे में आहत
और क्षत विक्षत, मैं पड़ा हुआ हूँ;
शक्ति ही नहीं है कि उठ सकूँ ज़रा भी
( यह भी तो सही है कि
कमजोरियों से ही मोह है मुझको )
इसीलिए, टालता हूँ उस मेरे प्रिय को
कतराता रहता,
डरता हूँ उससे
वह बिठा देता है तुंग शिखर के
ख़तरनाक ,खुरदरे कगार-तट पर ;
शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता मुझको
कहता -' पार करो पर्वत-संधि के गहवर,
रस्सी के पुल पर चलकर
दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुँचो '
अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों कि यात्रा,
मुझे डर लगता है ऊंचाईयों से;
बजाने दो सांकल !!
उठने दो अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुलों;
वह जन ....वैसे ही
आप चला जायेगा आया था जैसे
खड्डे के अँधेरे में मैं पड़ा रहूँगा
पीड़ाएँ समेटे !!
क्या करूँ , क्या नहीं करूँ मुझे बताओ;
इस तम्- शुन्य में तैरती है जगत-समीक्षा
की हुई उसकी
(सह नही सकता)
विवेक-विक्षोभ महान उसका
तम्-अंतराल में (सह नही सकता)
अंधियारे मुझमें द्युति-आकृति-सा
भविष्य का नक्शा दिया हुआ उसका
सह नही सकता !!
नहीं, नहीं,उसको मैं छोड़ नहीं सकूँगा
सहना पड़े मुझे चाहे जो भले ही

कमजोर घुटनों को बार-बार मसल,
लड़खडाता हुआ मैं
उठता हूँ दरवाजा खोलने,
चेहरे के रक्तहीन विचित्र शून्य को गहरे
पोंछता हूँ हाथ से
अँधेरे के ओर-छोर टटोल-टटोलकर
बढ़ता हूँ आगे
पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव,
हाथों से महसूस करता हूँ दिशाएँ
साँसों से अनुभव करता हूँ दुनिया
मस्तक अनुभव करता है आकाश,
दिल में तड़पता है अँधेरे का अंदाज
आँखे ये तथ्य को सूंघती-सी लगती
केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी
आत्मा में,भीषण
सत-चित-वेदना जल उठी , दहकी
विचार हो गये विचरण-सहचर
बढ़ता हूँ आगे,
चलता हूँ संभल-संभलकर
द्वार टटोलता,
जंग-खाई, जमी हुई, जबरन
चिटखनी हिलाकर
जोर लगा, दरवाजा खोलता,
झांकता हूँ बाहर ...

सुनी है राह, अजीब है फैलाव,
सर्द अँधेरा
ढीली आँखों से देखते हैं विश्व
उदास तारे
हर बार सोच और हर बार अफ़सोस
हर बार फ़िक्र
के कारण बढ़े हुए दर्द का मानो कि दूर वहाँ, दूर वहाँ
अँधियारा पीपल देता है पहरा
हवाओं की निःसंग लहरों में कांपती
कुत्तों कि दूर-दूर अलग-अलग आवाज़,
टकराती रहती सियारों की ध्वनि से.
कांपती हैं दूरियाँ, गूंजते हैं फासले
(बाहर कोई नहीं, कोई नहीं बाहर)
इतने में अंधियारे सुने में कोई चीख गया है
रात का पक्षी
कहता है :
'वह चला गया है,
वह नहीं आएगा, आएगा ही नहीं
अब तेरे द्वार पर
वह निकल गया है गाँव में शहर में !
उसको तू खोज अब
उसका तू शोध कर !
वह तेरी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति,
उसका तू शिष्य है (यद्यपि पलातक ...)
वह तेरी गुरु है ...'

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