13 June, 2009

कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी - एक

मेरी डायरी पर बहुत कम बहस हुआ करती है। लेकिन कल हो ही गयी। वो जो यशराज हैं न। वही, वही ! उस गली में रहते हैं। नहीं, नहीं, उनकी वकालत नहीं चलती। हाँ यूँ ही हैं, यों आदमी काबिल हैं। बी. एस-सी., बी.टेक.,एल-एल.बी., लेकिन बिलकुल बेरोजगार हैं। उस शहर में उन्हें सब जानते हैं। हँसते हैं उनपर। वे बेरोजगार हैं न, इसलिए। उनके चेहरे पर हमेशा शनीचरी छाया रहती है। खैर तो ’वसुधा‘ के लिए लिखी गयी ताजी-ताजी डायरी उन्हें सुनाने का मुझे जब सौभाग्य प्राप्त हुआ तो मैं बड़ा खु्रश था। क्या तीर मारा है मैंने !

यशराज गरदन नीचे डाले मेरी डायरी को चुपचान सुन रहे थे। जब सुनाना खत्म हुआ तो बहुत ही मन्थर गति से उन्होंने अपन सिर ऊँचा उठाया। कहने लगे- ”यह डायरी एकदम फ्राड है !” मुझ पर वज्रपात हो गया था। काटो तो खून नहीं। नाड़ी खिसक गयी। यशराज ने अपना चेहरा ऐसा बिगाड़ लिया था, मानो उनकी जबान का स्वाद एकदम कड़ुआ हो उठा !

डायरी मैंने बहुत मेहनत से बनायी थी। परसाई जी के पत्र-रूपी पिस्तौलों से सम्प्रेरित होकर मैंने इतनी मेहनत की थी। नतीजा क्या निकला....धूल राख.....बालू ! मैंने अपने मन को काफी नसीहत दी। उसकी पीठ थपथपायी। लेकिन निस्सन्देह उस समय मेंरा चेहरा बहुत पीला हो गया, क्योंकि मैंने उन क्षणों का अनुभव किया कि चेहरों का खून निचुड़ता हुआ दिल में टपक रहा है। मैंने यशराज की तरफ जब देखा तो मुझे सन्देह हुआ कि वह भी मुझपर हँस रहा है। मैंने अपने को सँवारते हुए, अटकते हुए और शब्दों के लिए भटकते हुए कहा, ”तुम भले ही फ्राड कह लो। इसमें व्यक्तिगत ईमानदारी जरूर है ! डायरी मेरी व्यक्तिगत ईमानदारी का सबूत है।”

यशराज ने अपनी मुसकान दबा ली। उसके होठों की उस छोटी-सी हलचल से मुझे घाव सा लग गया। मैं प्रयत्न करने लगा कि मेरी आंखों में क्रोध या खून दौड़ जाये। लेकिन, देह में रक्त ही नहीं था। दूसरे, अगर मैं अकड़ने का नाट्क भी करता तो भी बात न बनती क्योंकि वैसा करना मेरी बौद्धिक संस्कृति के मानदण्डों के बिलकुल विपरीत था।अब तक का इतिहास यह है कि मैं अपनी बुद्धि द्वारा हृदय को सम्पादित और संषोधित करता आया हँू। यह प्रक्रिया बिलकुल बचपन ही से चल रही है। जिन्दगी एक महाविद्यालय या विश्वविद्यालय नहीं है। वह एक प्राइमरी स्कूल है, जहा टाट पट्टी पर बैठना पड़ता हैं।

जी हाँ ! उस जिन्दगी का यही हाल है ! भय, आतंक, विचित्र आशंकाएँ अजीबो गरीब उलझाव, फटी हुई टाट पट्टियाँ, पुराने स्याही रंगे टेबल, गुरूजी की भयानक दुतरफा मूँछ और घर में माता पिता की डाँट फटकार और बच्चे का कोमल छोटा सा शरीर !सोचा था कि जल्दी जल्दी बड़ा हो जाउगा। ऊँचा, तगड़ा, मोटा। फिर, जिन्दगी, प्राइमरी न रहेगी। लेकिन, नहीं। ज्यों-ज्यों बड़ा होता गया खून सूखता गया। ऊँचा हुआ, साथ ही जर्जर भी। जिन्दगी पहले से भी बदतर प्राइमरी स्कूल होती गयी। जी हाँ, जिन्दगी-भर पाठ पढ़ना है। सिर्फ पहाड़े पढ़कर ही काम नहीं चलने का। गुणा-भाग की नयी से नयी कतर ब्यौंत करनी पड़ेगी। अँगुलियों में स्याही, कमीज पर नीले दाग, होठों के एक सिरे पर नीला रंग। मरने तक प्राइमरी स्कूल ही रहेगी यह जिन्दगी। वही पुरानी फटी टाट-पट्टी मानो मेरी कविता की एक पंक्ति !

यशराज की बात अलग है। वह आला आदमी है। वह आइन्स्टीन की बात करता है। प्लैंक और ला प्लाॅस उसकी जबान पर नाचते है। मैं ? इस मैं को नष्ट कर दो ! भारतीय संस्कृति का यह सन्देश है !यशराज का शब्द प्रवाह मेरे कानों में बहा, ”व्यक्तिगत ईमानदारी का क्या अर्थ है ?अधिक से अधिक वह अभिव्यक्ति की ईमानदारी है। इससे अधिक कुछ नहीं ! तुममें तो अभिव्यक्ति की ईमानदारी भी नहीं है।”यशराज न मालूम क्या कहता गया। मैं तो अपने मन में यह सोच रहा था कि मुझे तो बुद्धि के द्वारा अपने हृदय को सम्पादित और संशोधित करना है, उसमें पाद- टिप्पणियाँ जोड़नी है, भूमिका लिखनी है, सबके पीछे निर्देश- सूची भी तो जोड़ देनी है। किन्तु यह सम्पादन और संशोधन क्या कभी भी पूरा होगा ? क्या कभी भी मैं मास्टरपीस की भाँति उसे उपस्थित कर सकूँगा। शायद यह सम्भव ही नहीं है। कल ही तो बूढ़े ,बहुत बूढ़े, पिताजी ने मुझे कहा था कि आखिरी साँस टूटने तक नया सीखना पड़ता है, अपने आप में संशोधन करते रहना पड़ता है। लगातार सीखते जाना और नये-नये पाठ पढ़ने पड़ते हैं ! ऐसा !

मैंने यशराज से आत्मस्वीकृति के स्वर में कहा, व्यक्तिगत ईमानदारी का अर्थ है जिस अनुपात में, जिस मात्रा में, जो भावना या विचार उठा है, उसको उसी मात्रा में प्रस्तुत करना । जो भाव या विचार जिस स्वरूप को लेकर प्रस्तुत हुआ है, उसको उसी स्वरूप में प्रस्तुत करना लेखक का धर्म है !़यशराज ने जिद्दी आवाज में कहा, क्या उसका धर्म यहीं तक सीमित है ? यदि वह यहीं तक सीमित है तो वह व्यक्तिगत ईमानदारी भी नहीं है, अभिव्यक्ति की ईमानदारी भी नहीं !

यशराज से बहस करने की मेरी तबीयत नहीं हो रही थी। लगता था अगर कोई व्यक्ति एक कप चाय दे दे तो नसें गरमा जायें। फिर शायद बहस के काबिल हो सकूँ। फिर भी , अगर मैं जवाब न देता तो बहुत बुरा सा दीखता। आखिर ऐसी भी क्या बात है ! सम्भव है यशराज के पास भी कुछ ऐसा कहने के लिए हो जो मेरा पूरक हो सके । जरा इत्मीनान से काम लो !

मैंने कहा, ”कैसे ?”यशराज पिस्तौल से छूटी हुई गोली की भाँति उड़ता गया। उसने कहा, ”जो भाव या जो विचार जिस स्वरूप को लेकर जिस मात्रा में और जिस अनुपात में प्रस्तुत हुआ है, उसका उसी स्वरूप मे प्रस्तुत करना एकदम नाकाफी है। महत्व की बात यह है कि वह भाव या वह विचार किसी वस्तु-तथ्य से सुसंगत है या नहीं। व्यक्तिगत ईमानदारी का नारा देनेवाले लोग असल में, भाव या विचार के सिर्फ सब्जेक्टिव पहलू केवल आत्मगत पक्ष के चित्रण को ही महत्व देकर उसे भाव-सत्य या आत्म-सत्य की उपाधि देते हैं। किन्तु भाव या विचार का एक आब्जेक्टिव पहलू अर्थात वस्तुपरक पक्ष भी होता है। आजकल लेखन कार्य में आत्मपरक पक्ष को महत्व देकर वस्तुपरक पक्ष की उपेक्षा की जाती है। चित्रण करते समय आत्मपरक पक्ष को प्रधानता दी जाती है, वस्तुपरक पक्ष को नहीं। इस रवैये का असर टेकनीक पर पड़ता है।” यशराज की आँखें देखने के काबिल थीं। वह मुझे इस तरह देख रहा था मानो झिड़क रहा हो। किन्तु उसके चेहरे की ओर नहीं वरन् उसकी बातों की ओर ध्यान मैं देने लगा।यशराज कहता गया, ”मध्ययुगीन भारतीय काव्य में कुछ महत्वपूर्ण अपवादो को छोड़, प्रधान प्रवृत्ति वस्तुपक्ष के वर्णन की ओर ही अधिक रही। इस प्रवृत्ति ने आत्मपक्ष को गौण स्थान दिया। नये छायावादी युग ने आत्मपक्ष को ही प्रधान स्थान दिया और वस्तुपक्ष को गौण। यदि हिन्दी की नयी कविता को साहित्य के इतिहास में, या यूँ कहिये कि संस्कृति के इतिहास में, कोई महत्वपूर्ण पार्ट अदा करना है, तो उसे काव्य की प्रकृति तथा शिल्प में आत्मपक्ष का समन्वय उपस्थित करना होगा।”

यशराज ने विजेता की आँखों से मुझे देखा। निस्सन्देह मुझे पराजित होना पड़ा। मैंने दो सेर का अपना सिर हिलाकर उसकी हाँ में हाँ मिलायी। तब एकाएक मुझे भान हुआ मानो मेरे मस्तक की सन्दूक में सचमुच आलू और भण्टे भरे हैं ! उनकी तो तरकारी भी नहीं हो सकती।इसके बावजूद मैं यशराज की बात ज्यादा ध्यान से सुनने लगा। मुझे प्रतीत हुआ कि उसे ऐसा कुछ कहना है जो मेरे लिए मूल्यवान् भी सिद्ध हो सकता है।मैंने प्रार्थना के स्वर में कहा, ”यशराज, मैं नयी कविता का कोई प्रवक्ता नहीं हूं। मैं तुम्हारी बात मानने के लिए मान भी लूँ; किन्तु मेरे लिए यह एक बड़ा रहस्य ही बना रहेगा कि किस प्रकार वस्तुपक्ष से आत्मपक्ष का समन्वय स्थापित किया जाता है ?”

यशराज ने बीच ही में बात काटते हुए कहा, मैं तो तुम्हारी डायरी के बारे मैं बात कर रहा था। उसके प्रसंग से नयी कविता पर चला आया। तुमने जगह जगह, व्यक्तिगत ईमानदारी की जो बात कही हे वह बहुत ही कुहरिल है। ‘व्यक्तिगत ईमानदारी’ की क्या परिभाषा है ? मैं बहुत सी नयी कविताएँ पढ़ता हूं। मुझे उनमें कुछ विशेष ईमानदारी नहीं मालूम होती। यशराज कहता गया, ”नयी कविता की भी एक लीक पड़ गयी है। वह भी एक ढर्रा है। ढर्रे में सब कुछ खपाया जा सकता है। एक बार शिल्पविधान पर अधिकार हो जाये कि बस...!”

उसने कहना जारी रखा, ”यह तो तुम जानते हो कि भाव या विचार का एक वस्तुतत्व भी होता है अर्थात् वह एक ऐसी मानसिक प्रतिक्रिया है जो किसी वस्तुतत्व के प्रति की गयी है। इस मानसिक प्रतिक्रिया में सत्यत्व तो तभी उत्पन्न होगा जब उसमें वस्तुतत्व का वस्तुमूलक आविर्भाव हो। साथ ही उसमें यह बोध भी सम्मिलित हो कि जो मानसिक प्रतिक्रिया उस वस्तुतत्व के प्रति हुई है, वह सही है या गलत, उचित है या अनुचित, ठीक अनुपात में है कि गलत अनुपात में। यदि ऐसा नहीं हुआ तो बड़ी अजीब बात होगी।”

मैंने मुसकराकर कहा, ”हजरत, काव्य की प्रक्रिया ज्ञानात्मक प्रक्रिया नहीं है।” यशराज ने जवाब दिया, ”ठीक। किन्तु ज्ञान और बोध के आधार पर ही भावना की इमारत खड़ी है। यदि ज्ञान और बोध की बुनियाद गलत हुई तो भावनाओं की इमारत भी बेडौल और बेकार होगी। उसका असर काव्य शिल्प पर भी होगा।”

यशराज कह कहकर क्षणमात्र चुप रहा मानो साँस लेना चाह रहा हो। वह आगे कहता गया, व्यक्तिगत ईमानदारी वहाँ लक्षित होगी जहां वस्तु का वस्तुमूलक आकलन करते हुए लेखक उस आकलन के आधार पर वस्तुतत्व के प्रति सही सही मानसिक प्रतिक्रिया करे। यदि वह ऐसा नहीं करता तो उसकी प्रतिक्रिया में सत्यत्व का आविर्भाव नहीं होगा।

मैंने कहा, ”तुम्हारी परिभाषा यदि स्वीकार कर ली जाये तो काव्य के क्षेत्र में एक दंगा सा मच जायेगा। असलियत यह है कि तुम जिस वस्तुमूलक सत्य की बात करते हो, वह काव्य के भाव सत्य से अलग है....”यशराज ने आँखे फाड़कर मेरी तरफ देखना शुरू किया मानो मैं कोई जिराफ या कंगारू जैसा अजीबो-गरीब प्राणी होऊँ। मैंने भी बहुत गम्भीरता से उत्तर दिया, ”मैं भी अपनी बात कहाँ समझा पा रहा हूँ !”

दोनों ने अपने अपने आसन बदले।मैंने शून्य की ओर देखना शुरू किया। उस शून्य में मुझे दो बातें नजर आयीं। एक तो यह कि यशराज के अनुसार मानसिक प्रतिक्रिया जिस वस्तु के प्रति होती है उस वस्तु का भी चित्रण परमावश्यक है, दूसरी यह कि सत्यत्व के आविर्भाव के लिए यह जरूरी है कि कवि उक्त वस्तुतथ्य के प्रति सही सही मानसिक प्रतिक्रिया करे।यशराज के इस अभिमत पर मेरे मन ने इस प्रकार टिप्पणी की। मन कहता गया: अपनी मानसिक प्रतिक्रिया वस्तुतथ्य के प्रति सही सही है या नहीं इसकी कसौटी क्या है ?

मेरे खयाल से कवि लेखक अपने दृष्टिकोण से किसी वस्तुतथ्य के प्रति प्रतिक्रिया करता है। माना कि मानसिक प्रतिक्रिया मे सवेंदना अन्तर्भूत है, किन्तु उसमें दृष्टि या दृष्टिकोण भी अन्तर्भूत है। संवेदना और दृष्टि दोनों से मिलकर मानसिक प्रतिक्रिया होती है। हाँ, यह आवश्यक नहीं है कि मानसिक प्रतिक्रिया करते समय कवि उस दृष्टि या दृष्टिकोण के पीछे रहनेवाली अर्थात् उसकी पाश्र्वभूमि के रूप में सारी वस्तुएं एक साथ नहीं रह सकतीं। किन्तु ध्यान अलग चीज है, मन अलग बात है। ध्यान में तो वस्तुतथ्य है, उस वस्तुतथ्य के प्रति संवेदनात्मक प्रतिक्रिया की गयी है, किन्तु उस प्रतिक्रिया में प्रच्छन्न रूप से अथवा अर्ध-सचेत रूप में कवि की दृष्टि या दृष्टिकोण अवश्य रहता है। यह दृष्टि या दृष्टिकोण अनिवार्यतः बौद्धिक ही होता है, यह नहीं कहा जा सकता। हम उसके दृष्टिकोण को रूख या रवैया भी कह सकते हैं। मजेदार बात यह है कि कभी कभी मानसिक प्रतिक्रिया करते समय तो एक रुख या दृष्टि रहती है किन्तु मन एक इकाई ही नहीं होता। उस इकाई के भीतर दुई भी होती है। ऐसी स्थिति में मानसिक प्रतिक्रिया के भीतर एक रुख और उस प्रतिक्रिया को सम्पादित और संशोधित करने वाली एक और दृष्टि रहती है। विवादियों के एक पक्ष का कहना है कि मानसिक प्रतिक्रिया का यह संशोधन सम्पादन अनावश्यक है, गलत है, खतरे से भरा हुआ है। यहाँ बेईमानी हो सकती है, जान-बूझकर की जाती हैं इसलिए होना यह चाहिए कि व्यक्तिगत मानसिक प्रतिक्रिया को ज्यों का त्यों, ठीक-ठाक अनुपात और मात्रा में प्रकट किया जाये।उनके इस अभिमत में बहुत कुछ सार है। काव्य में लम्बी-चौड़ी बात हंाकनेवाले, स्वाँग करनेवाले, अपने को मसीहा और क्रान्तिकारी समझकर बात करनेवाले लोग छोटी-सी मानसिक प्रतिक्रिया को अपनी दृष्टि के अनुसार बहुत बढ़ा-चढ़ाकर रखते हैं। वे एक ऐक्टर हैं, नट हैं। वास्तविक प्रेम करने का आत्मबल उनमें बिलकुल भी नहीं है; किन्तु स्वाँग ऐसा करते हैं मानो वे अपनी प्रमिका के बिना जी नहीं सकते। अगर हम मानसिक प्रतिक्रिया को ज्यों-त्यों स्वभाविक अनुपात और मात्रा में, व्यक्त करने का आग्रह नहीं करते, उस आग्रह को महत्व नहीं देते, तो काव्य में से अभिनेता तथा स्वाँग वाले लोग, लम्बी-चैड़ी बात हाँकने वाले सज्जन, बिला शक एक झूठा साहित्य पैदा कर देते हैं। ऐसे लोग मन की इकाई में जो दुई है उसकी प्रकृति के अनुसार अपनी मूल मानसिक प्रतिक्रिया को सम्पादित और संशोधित करते हैं। कहते हैं कि काव्य एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है- मात्र व्यक्तिगत नहीं। इसलिए उन्हें काव्य-सृजन के दौरान (मन के भीतर) अभिनेतृत्व करने, स्वाँग रचने, लम्बी-चैड़ी हाँकने आदि-आदि की पूरी छूट है। वे कहते हैं कि काव्य एक सांस्कृतिक संस्था है, वह मात्र व्यक्तिगत कमरा नहीं।खैर, बड़े-बड़े शब्दों को जाने दीजिए।

मैं भी मानसिक प्रतिक्रिया को सम्पादित और संशोधित करने की बात कहता आया हूं। मेरे इस मन्तव्य का क्या वास्तविक अर्थ है ? और यह यशराज जब मानसिक प्रतिक्रिया के सहीपन की बात करता है, वस्तुतथ्य के प्रति सही-सही मानसिक प्रतिक्रिया करने पर जोर देता है तो उसकी इस बात का निर्देशक महत्व क्या है ? क्या यशराज यह कहना चाहता है कि कवि जीवन-जगत् के प्रति वास्तविक विश्व-दृष्टि का विकास करे, और वह विश्व-दृष्टि उसकी मानसिक प्रतिक्रिया की प्रेरक हो ? यदि सचमुच इतनी सब बातें क्षण-भर में सोच गया। भीतर का मेरा अपना सारा विचार-जगत् मूर्तिमान हो उठा। किन्तु यशराज की बातों का प्रवाह कहीं और जा रहा था।वह कहता गया, ”व्यक्तिगत ईमानदारी वह है जहाँ लेखक वस्तु का सही मानसिक प्रतिक्रिया करे। यदि वह ऐसा नहीं करता तो उसकी प्रतिक्रिया में सत्यत्व का आविर्भाव उत्पन्न नहीं होगा। यही न ?”

मैंन जवाब दिया, तुम्हारी परिभाषा यदि स्वीकार कर ली जाये तो काव्य के क्षेत्र में एक हंगामा मच जायेगा। काव्य का सत्य, शासकीय या वैज्ञानिक सत्य नहीं है। यदि वस्तुतः वैसा होता तो अब तक दुनिया में जितना भी काव्य-साहित्य उत्पन्न हुआ है वह तुम्हारी परिभाषा का अनुगमन करता।यशराज बीच में बोल उठा, ”मैं तो व्यक्तिगत ईमानदारी की बात कर रहा हूँ। मैं तो यह कहना चाहता हूँ कि हिन्दी में (मैं हिन्दी की बात ही बोल सकता हूं ) बहुतेरी ऐसी कविताएं हैं जो बिलकुल फ्राड हैं। जिन्हें तुम नयी कविता कहते हो, उसमें भी फ्राड की कमी नहीं है।”शायद यशराज ने मुझे उत्तेजित करने के लिए यह कहा होगा। लेकिन ईश्वर की कुछ ऐसी कृपा रही कि मैं विचलित नहीं हुआ।

मैंने शान्त भाव से तिरछी मार की। मैंने कुछ आलोचकों के नाम भी लेना चाहे। लेकिन कुछ सोचकर चुप रह गया। आलोचक भी तो झूठ के साथ-साथ कभी सच बोल जाया करते हैं। हाँ, यह होता है उनके मसीहाई बौद्धिक अहंकार के बावजूद !

मैं शान्त था, किन्तु उत्तेजना घर कर रही थी। हमारी और यशराज की आपसी सिर-फुटौवल कई बार हो भी चुकी है। इसलिए उससे घबराने की बात नहीं थी।

3 comments:

  1. yaar itanii lambii post tukado me lagaya karen...computer par ekagrata nahii ban pati

    poora padhkar fir tippanii dunga

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  2. apna e mail id jarur de yaa mujhe mail karein
    sweetcareashu@gmail.com

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  3. mahatva poorn baaten hain lekin chhote post deejiye. teen-chaar minute me padhe ja sakne wale.....

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