25 June, 2009

कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी: दो

बात चल रही थी आलोचना और काव्य पर। यशराज न जाने किस बात पर चीखकर टेबल पर घूँसे मारन लगा और बोला, ”हाँ, आलोचना में फ्राॅड होता है, किन्तु काव्य में भी होता है। एक तो फ्राॅड जान-बूझकर किया जाता है अर्थात् काव्य में लेखक जो दृष्टि अपनाता है वह उसकी अन्तर्दृष्टि नहीं होती। कवि एक अभिनेता भी है। सफलतापूर्वक अभिनय करने के बाद भी वह अभिनय ही है। वह असल की नकल है। उसमें असल की बू हो सकती है लेकिन वह असल नहीं है।”

मुझे हँसी आ गयी है। यशराज के असाहित्यिक शब्द ’असल’ और ’नकल’ मुझे भा गये। बड़े अच्छे शब्द हैं ! एक बात और भी महत्वपूर्ण हुई। वह यह कि यशराज काव्य का सत्यत्व वहाँ मानता है जहाँ लेखक अन्तर्दृष्टि को दरकिनार रखते हुए अभिनेतृत्व करता है। तो मतलब यह कि यशराज यह मानता हे कि मानसिक प्रतिक्रिया को ठीक-ठीक अनुपात में ज्यों का त्यों देखने के अनुरोध के महत्व को स्वीकार करना है ! यही न ? लेकिन मैंने यह बात जबान से नहीं निकाली। मैं तो सिर्फ सुन रहा था। यशराज ने कहा, काव्य में एक दूसरे ढ़ंग का फ्राड भी होता है।

मैंने कहा , ”कौन-सा ?”
यशराज ने जवाब दिया, यह फ्राड तब होता है जब लेखक यह जानता ही नहीं कि वह फ्राॅड कर रहा है। लेखक को पूरा विश्वास होता है कि जो बात वह कह रहा है, सही कह रहा है। अर्थात् जहाँ लेखक ईमानदारी से मूर्ख हेता है। लेखक को यह भी विश्वास होता है कि उसकी बात केवल सच्ची ही नहीं वरन् सुन्दर भी है और कल्याणकारी भी। लेखक पूर्ण निष्ठा के साथ बात कर रहा है। फिर भी उसकी निष्ठा फ्राॅड को जन्म देती है या जन्म दे सकती है।

"-मतलब यह कि लेखक की निष्ठा और आत्मविश्वास कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो उसके साहित्य को फ्राॅड बन जाने से बचाये। दूसरे शब्दों में, लेखक सम्पूर्ण निष्ठा और आत्मविश्वास के साथ भी बड़ा ही सन्तुलित फ्राॅड कर सकता है। ध्यान रखो कि इसका अर्थ यह भी नहीं कि निष्ठा और आत्मविश्वास ऐसी शक्ति है जो अनिवार्य रूप से और हमेशा असहित्य को फ्राॅड ही बनाती है। किन्तु अपनी बात पर निष्ठा और आत्मविश्वास होने मात्र से साहित्य निर्मल, छल-रहित, फ्राॅडलेस नहीं होता।”

यशराज की उत्तप्त मुखमुद्रा देखकर मुझे सचमुच हँसी आ गयी। मैंने ठठाकर हँसते हुए कहा, ”तो तुम क्या सोचते हो ? लेखक अपने ही खिलाफ, अपने वस्तुतत्व के विरुद्ध, अपनी मानसिक प्रतिक्रियाओं के विरुद्ध, जासूसी करे और सी.आई.डी.- गिरी करे ? इतना बेवकूफ लेखक नहीं होता !”

यशराज ने झुझलाते हुए कहा, ”मजाक मत करो, असलियत को देखो !”

इस बात पर मुझे और हँसी आ गयी। फिर भी यशराज की बात का आदर करते हुए मैंने कहा, ”अच्छा, तो इस दूसरे किस्म के फ्राॅड को जरा और समझाइए ! मैं ध्यानमग्न होकर सुन रहा हूँ !”यशराज बोलता गया, ”बस, तुम सरीखे श्रोता मुझे मिल जाये तो मजा आ जाये। आजकल ईमानदार श्रोताओं की बड़ी कमी है। वक्ता तो बहुत ईमानदार होते हैं !”

दोनों की बात ठहाकों में डूब गयी ! यशराज कहता गया -

”लेखक ईमानदारी से फ्राॅड वहा करता है जहाँ उसे मालूम ही नहीं हेता है कि वह स्वयं फ्राॅड को जन्म दे रहा है। दूसरे शब्दों में, उसक विचार या उसकी अनुभूतियाँ वस्तुतत्व के वस्तुमूलक आकलन पर आधारित नहीं होतीं। अन्यथा, वे ऐसी होती हैं कि जो जीवन के यथार्थ से नियन्त्रित न होकर उसके आत्मबद्ध दृष्टिकोण के फलस्वरूप विक्षेप-ग्रस्त ही होती हैं। ऐसी स्थिति में लेखक की भावना का ज्ञानात्मक आधार गलत होता है। इस ज्ञानात्मक आधार की विकृति के फलस्वरूप उसकी भावना भी विकार-ग्रस्त ही होती है। दूसरे शब्दों में लेखक जब केवल सब्जेक्टिव होता है- भले ही वह आब्जेक्टिविटी का आभास निर्माण करता रहे- अर्थात् जब वह अपनी तथाकथित अन्तर्दृष्टि को वस्तुतत्व पर थोपता है या अपनी तथाकथित अनुभूति के रंगीन चश्मे से वस्तुतत्व को देखता है तब उसके साहित्य में निस्सन्देह फ्राॅड उत्पन्न होता है !”

यहाँ मैंने यशराज की लगाम थाम ली। मैंने कहा, ”मिस्टर, जब हम काव्य के वस्तुतत्व की बात करते हैं तब हम उस भाव-समुदाय की बात कर रहे हैं जो कि कवि की वाणी द्वारा व्यक्त होता है।”

यशराज उत्तेजित हो उठा। उसने आवेश से कहा, ”मैं काव्य के वस्तुतत्व के बारे में तुम्हारी परिभाषा मानने के लिए तैयार नहीं हँू। काव्य में एक मानसिक प्रतिक्रिया या प्रतिक्रियाओं की श्रृंखला व्यक्त होती है। वस्तुतः यह मानसिक प्रतिक्रिया नहीं है जिसके प्रति और जिसके बारे में यह प्रतिक्रिया हुई है। अर्थात् मैं भावों के आलम्बन की बात कर रहा हूँ समझ गये हजरत!”

मैंने खीजकर कहा, भावों के आलम्बन की बात करो। काव्य के वस्तुतत्व में तो भाव और उसका आलम्बन दोनों आयेंगे। हाँ, आगे चलो !

यशराज ने कहा, मैं तो अपने शब्दों में बात करूंगा।

मैंने बीच ही में टोककर जवाब दिया, जिसका सम्बन्ध उसकी बात से कुछ भी नहीं था। मैंने कहा,क्या तुम यह मानते हो कि वैसा फ्रॅाड बहुत सुन्दर भी हो सकता है, बहुत मनमोहक और बहुत आकर्षक !यशराज ने एकदम कहा, यही तो उसकी खराबी है ! चूँकि वह मनमोहक और आकर्षक होता है इसलिए वह पाठकों को अधिक प्रभावित करता है ! किन्तु इससे केवल इतना ही सिद्ध होता है कि फ्रॅाड भी एक कला है- ललित कला। और जो फ्रॅाड है वह ललित कला भले ही हो, वह व्यक्तिगत ईमानदारी के आधार पर उपस्थित ललित कला नहीं है। मैंने सन्त्रस्त हो कर कहा, आखिर तुम कहना क्या चाहते हो ? उसने जवाब दिया, भावना का ज्ञानात्मक आधार जब तक वस्तुतः शुद्ध है तभी तक वह भावना फ्रॅाड नहीं है। किन्तु ज्ञान का भी निरन्तर प्रसार और विकास होता हैं चूँकि ज्ञान के क्षेत्र में ही भावना विचरण करती है इसलिए ज्ञान को अधिकाधिक मार्मिक यथार्थ-मूलक और विकसित करने का जो संघर्ष है वह वस्तुतः कलाकार का सच्चा संघर्ष है। यदि कवि या कलाकार यह संघर्ष त्याग देता है, तो वह सचमुच ईमानदार नहीं है। सच तो यह है कि व्यक्तिगत ईमानदारी के भीतर ही एक बहुत बड़ा संघर्ष होता है। दूसरे शब्दों में, कला के क्षेत्र में व्यक्तिगत ईमानदारी स्वयं सिद्ध नहीं वरन् प्रयत्न-साध्य होती है !वे क्या इसका मतलब यह है कि जो लेखक लेखन-कार्य के सम्बन्ध में पूर्णतः सचेत नहीं है अर्थात् जिस लेखक की रचना अनायास, बिना परिश्रम क सहज रूप से प्रसूत होती है उस लेखक में व्यक्तिगत ईमानदारी का अभाव है। हम एक उदाहरण लें। शैले का काव्य भावनाओं का अनायास पूर कहा गया है। चँूकि वह काव्य प्रयत्न-साध्य नहीं था, वरन् एक विशेष अर्थ मे अनायास था, इसलिए तुम्हारे अनुसार उसमें व्यक्तिगत ईमानदारी का अभाव रहा है।यशराज इस जगह आकर कुछ संकोच मे पड़ गया। वह देर तक मेरी बातों का जवाब न दे सका। व्यक्तिगत ईमानदारी के सम्बन्ध में उसने आगे जो स्पष्टीकरण दिया वह बड़ा ही मजेदार है।

यशराज कहता गया - तुमने एक बड़ी अच्छी कठिनाई उपस्थित कर दी। लेकिन हाँ उसका भी हल है। शैले की बहुत सी ऐसी कतिवाएँ हैं जिनका ज्ञानात्मक आधार उस युग विशेष की परिस्थिति के घेरे के भीतर- पहले के कवियों के ज्ञानात्मक आधार से अधिक विकसित था। शैले की रोमैण्टिक दृष्टि, क्लासिकल पुराण-पन्थी कवियों की रूढ़िवादी दृष्टि की तुलना में, कहीं अधिक पारदर्शी थी। साथ ही युग की उत्थानशील शक्तियों ने शैले को जो उतकृष्ट मानवतावादी स्वप्न देकर रखा था उस स्वप्न से वह कवि प्रेरित था। व्यक्ति की आत्मगरिमा तथा व्यक्ति के भीतर की उत्थानशील स्निग्ध आध्यात्मिक सम्भावनाएँ शैले के काव्य में प्रकट होती हैं। शैले के काव्य का ज्ञानात्मक आधार निस्सन्देह अन्य कवियों की अपेक्षा न केवल सत्यात्मक था, तथ्यात्मक था, वरन् वह अधिक विशद, विस्तृत और निर्णायक भी था। दूसरे शब्दों में, शैले में एक विशाल जागरूकता थी। इस ज्ञानात्मक आधार कमजोर तब होता है जब कवि समाज को प्राप्त अद्यतन ज्ञान की उपेक्षा कर अद्यतन ज्ञान द्वारा सम्प्रेरित भावनाओं से दूर हटकर केवल अपने ऐकान्तिक निविड़ लोक में ही विचरण करता है, ज्ञान का अर्थ केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों का बोध ही रहीं है, वरन् समाज की उत्थानशील तथा हृासोन्मुख शक्तियों का बोध भी है। शैले के काव्य का सौन्दर्य उस मनोभूमिका से उत्पन्न हुआ है जो अपने युग में विकासमान उत्थानशील प्रवृत्तियों से परिपक्व हुई है। शैले को ज्ञान ने स्वप्न दिया, स्वप्न ने भावना दी। उसका समस्त साहित्य इस मनोभूमिका से अनुरंजित है। शैले के काव्य की कुहरिलता के कारणों के सम्बन्ध में मैं पहले ही कह चुका हूँ। वास्तविकता यह है कि तुलनात्मक दृष्टि से शैले बहुत जागरूक कवि था। वह अपने जमाने की उत्थानशील मानवतावादी शक्तियों से आध्यात्मिक सम्बन्ध अनुभव करता था। कला के क्षेत्र में भी वह इतना अधिक जागरूक था कि वह अपने युग के मनोहर स्पन्दनों को अपने काव्य में अपने स्वप्नों के माध्यम से व्यक्त कर सका। किन्तु हम अन्य रोमैण्टिक लेखकों और कवियों को लें। उनमें से कइयों में हमें छù मनोवैज्ञानिकता दिखाई देती है। छù मनोवैज्ञानिकता का भी एक बहुत बड़ा व्यापार होता है। हिन्दी के रोमैण्टिक कवियों में ऐसी छù भावनाएँ बहुत देखने को मिलेंगी ! यह छù मनोवैज्ञानिकता एक विशेष प्रकार की अभिरुचि से उत्पन्न होती है और उस अभिरुचि को वह दृढ़ करती है। अभिरुचि स्वयं इस कपटजाल को जन्म भी देती है। अभिरुचि के के साथ-साथ कई प्रकार के सेन्सर्स लगे रहते हैं। लेखक को अनेक प्रकार के सेन्सर्स यानी गहरे अन्तर्निषेध का सामना करना पड़ता है। कुछ अन्तर्निषेध ऐसे होते हैं जो उसके काव्यसम्बन्धी यथार्थ की संवेदनाओं को भी काटकर फेंक देते हैं। काव्य का जो वास्तविक तत्व है जिसके कारण और जिसके द्वारा सौन्दर्य प्रकट होता है, उसी से पता चल जाता है कि लेखक छù भावनाओं का व्यापार कर रहा है या क्या !

यशराज कहता गया, ये अन्तर्निषेध उसकी बहुत-सी अच्छी और सच्ची भावनाओं के स्रोत को भी सुख देते हैं। फलतः जो काव्य प्रसूत होता है वह जाली होता है। हिन्दी में जाली कविताओं की कमी नहीं। कभी-कभी ऐसा जाली साहित्य भी कुछ परम्परागत गुण व्यक्त करता आया है। कवि के अभ्यास-वश काव्य में लालित्य आदि गुण उत्पन्न हो जाते हैं। जिसके फलसवरूप कुछ लोग उन्हें साहित्य की अमूल्य न्धिि में जमा कर देते हैं। यशराज आगे कहता गया, ऐसे काव्य में प्रकट भावनाएँ जाली होने के कारण बहुधा अप्राकृतिक भी हो उठती हैं। कविता का धर्म है- अपनी प्रकृति से और काव्य के वस्तुतत्व की प्रकृति से एकाकार होना। व्यक्तिगत ईमानदारी का यह बहुत बड़ा तकाजा है कि लेखक निर्भीकतापूर्वक अपने अन्तर्निषेधों को सुधारे,उनका सामना करें। साथ ही, वह अपनी प्रकृति में और वस्तु के प्रकृति में प्रवेश करे। इस अन्तःप्रवेश के रास्ते में जो भी सामने आता हो उस जोर से हटा दे। दूसरे शब्दों में, अपनी अन्तःप्रकृति और वस्तु की प्रकृति में प्रवेश करने के उद्देश्य से, काव्यसम्बन्धी अपनी अभिरुचि भी बदल डाले - वह अपना, अपने स्वयं का , लगातार संशोधन और सम्पादन करता जाये...!

मैं एकदम बोल पड़ा, ”ओ, हीअर आइ सी (यहाँ मैं तुमसे सहमत हॅँू) !” यशराज आगे कहता गया, जो लेखक अपने हृदय को (तुम्हारे शब्दों में) निरन्तर संशोधित और सम्पादित नहीं करता है, उसका विकास रुक जाता है। यह संशोधन और सम्पादन, कवि की जीवन-दृष्टि के द्वारा ही सम्पन्न होना चाहिए, स्वाँग रचने के लिए नहीं।

यशराज बहुत ज्यादा बोल गया था। कभी-कभी मेरा ध्यान भी उचट जाता। फिर भी मैं एकाग्रतापूर्वक उसकी बात सुनने का प्रयत्न कर रहा था। यशराज कह रहा था, ”कवि का यह धर्म है कि उसके दिल में जो नकारशील खटके हैं, जो अन्तर्निषेधों हैं, उन्हें विवेकसंगत बनाया जाये। केवल विशेषाभिरुचि के वशीभूत होकर का विकास न किया जाये । ध्यान रहे कि ये अन्तर्निषेध लेखक स्वयं अपने लेखन-कार्य के दौरान में विकसित करता है। उनका विकास किस प्रकार होता है, यह विषय ही अलग है। महत्व की बात यह है कि अन्तर्निषेधों का विवेकसंगत विकास हो। व्यक्तिगत ईमानदारी का यह बहुत बड़ा तकाजा है। यदि काव्य के वस्तुतत्व की प्रकृति और कवि की प्रकृति दोनों का समाहार करनेवाली कवि-दृष्टि ऐसी है जो जीवन के लिए उस कवि दृष्टि का महत्व अत्यन्त सीमित है तो उस काव्य को हम भले ही सुन्दर कह लें, वह हमारे जीवन पर विशेष प्रभाव नहीं डाल सकता अर्थात् वह हमारे जीवन-विवेेक को सविकसित और पुष्ट नहीं कर सकता। ध्यान रखिए कि कवि-दृष्टि के रूप में ही ले रहा हँू।” यहाँ यशराज की साँस खत्म हो गयाी।

यशराज की विवेचन-बुद्धि ने निस्सन्देह मुझे बहुत प्रभावित किया। मेरे मन में विचारों का ताँता-सा शुरू हो गया। यशराज को चुप देख मैंने भी अपना कुछ जोड़ना चाहा।मैंने कहा, यशराज, सुनो। अब मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ। ध्यान से सुनना ! भले ही काव्य रचना की सच्ची मनोभूमिका काव्य-रचना के क्षणें के बाहर निरन्तर तैयार होती रहती है। यदि इस मनोभूमि की तैयारी के दौरान कवि सचमुच ईमानदार है, यानी वह अपनी जीवन-दृष्टि व्यापक और गहरी रखने का प्रयत्न करता है, तो उस काव्य-रचना से सम्बनिधत वह मनोभूमिका भी अधिकाधिक विशद और यथार्थ होती जायेगी ऐसा मेरा खयाल है। इसलिए में यह कहता हूँ कि काव्य-रचना एक परिणाम है किसी पूर्वगत प्रदीर्घ मनःप्रक्रिया को जो अलग-अलग समयों में बनती गयी और अपने तत्व एकत्र करती गयी है। काव्य-रचना में जो अनायासता उत्पन्न नहीं होती। वरन् काव्य-रचना की पूर्वगत मनोभूमिका की समृद्धि के फलस्वरूप उत्पन्न होती है। इसलिए व्यक्तिगत ईमानदारी का सम्बन्ध काव्य-सम्बन्धी मनोभूमिका से अधिक है। यदि यह मनोभूमिका आत्मपरक और वस्तुपरक अर्थात् उन दोनों से समन्वित जीवनपरक दृष्टि से तैयार की गयी है तो उस कवि का क्या कहना ! वह निस्सन्देह समृद्ध करती है। इस सतह पर मुख्य प्रश्न दृष्टि का है। मानवता के कवि की दृष्टि विश्व-जनता के उद्देश्यों से एकाकार, अर्थात् जब कवि की भावनाओं का ज्ञानात्मक आधार विस्तृतव्यापक और अद्यतन है तो ऐसी स्थिति में उस कवि की दृष्टि ही उसके अन्तःकरण में एक वातावरण निर्माण करेगी, एक काव्यात्मक मनोभूमिका तैयार करेगी। मनोभूमिका या वातावरण के बिना सत्काव्य सम्भव ही नहीं। सच तो यह है कि काव्य-साधना, कला-साधना काव्य रचना या कला-प्रक्रिया के दौरान में ही सीमित नहीं होती। काव्य-साधना या कला-साधना का अधिकतर भाग, काव्य-रचना के क्षणों से बहुत बाहर होता है। इसलिए कलाकार के लिए यह आवश्यक है कि वह ज्ञानात्मक आधार का अधिकाधिक विस्तार कर, ज्ञान-स्वप्न दे सके, स्वप्न-भावनाएँ उत्सर्जित कर सके । मानसिक प्रतिक्रिया का संॅपादन-संशोधन यदि उस स्वप्न द्वारा प्रस्तुत हेता है तो निस्सन्देह वह कल्याणकारी है। उस ज्ञानात्मक आधार पर ही मन अपने का सम्पादित और संशोधित करता रहेगा। कवि के अनुभूतिमय जीवनकाल में ही यह संशोधन-सम्पादन चलता रहेगा।” किन्तु जब काव्य-रचना एक सृजन-प्रक्रिया के रूप में चलती है उस समय कवि कृत्रिम रूप से संशोधन-सम्पादन चलता रहा तो कवि पर अभिनेतृत्व और स्वाँग का अभियोग-आरोप सही हो जायेगा। किन्तु यदि ज्ञानात्मक आधार पर विकसित जीवन-स्वप्न ही स्वयं मानसिक प्रतिक्रिया का संशोधन-सम्पादन करता रहे तो निःस्सन्देह वह काव्य-रचना के एक अत्यन्त स्वाभाविक अंग के रूप में ही प्रस्तुत होगा।”यशराज ने कहा, तो व्यक्तिगत ईमानदारी काहे में है ?

ज्ञानात्मक आधार को विस्तृत से विस्तृत करने, उसे अत्यन्त व्यापक बनाने, उसके आधार पर जीवन-स्वप्न विकसित करने, जीवन-स्वप्न के अनुसार मानसिक प्रतिक्रियाओं को दिशा देने अर्थात् अपने ही अन्तःकरण का संशोधन-सम्पादन करने में ही व्यक्तिगत ईमानदारी परिलक्षित होगी। तुम्हारी बात भी सही हे। काव्य-साधना, अधिकतर, काव्य-रचना के क्षेत्र के बाहर होती है। हाँ, यह बात सही है।व्ह मुझे देखकर मुसकराया। उसके स्मित में एक अजीब ही तृप्ति थी। जी हाँ, वह बेरोजगार है। गरीब है, ठुकराया हुआ भी है, समाज में उसकी कोई इज्जत नहीं है। लेकिन वह निःस्पृह भी है। क्या वह सुकरात नहीं है ? मेरी माँ ने मुझे बताया था कि भगवान् भिखारियों का वेश लेकर अपाहिजों के रूप में भटकतें हैं और परीक्षा लेते हैं। भगवान् पर मेरी आस्था नहीं है लेकिन मनुष्य पर तो है। इतने में मुझे खयाल आया कि ‘ज्ञानात्मक आधार‘ की परिभाषा होना आवश्यक है। मैंने यशराज से पूछा -ज्ञानात्मक आधार से तुम्हारा मतलब वैज्ञानिक जानकारी के अलावा भी कुछ है या नहीं ?

वह हँस पड़ा। उसने कहा, ”जीवन-जगत् का जो बोध है उसका व्यापक होना, पुष्ट होना, विश्व में ज्ञान का जो आज विकास स्तर प्राप्त है, उसको आत्मसात् करना और उससे आगे बढ़ना आवश्यक है। भावना उसी क्षेत्र में सक्रिय हाती है जो क्षेत्र वस्तुतः ज्ञानशक्ति द्वारा गृहीत हो। बोध यानि ज्ञान के क्षेत्र भीतर ही भावना की पहुँच है, उसके बाहर नहीं । इसीलिए यह आवश्यक है कि हमारे जीवन का ज्ञानात्मक आधार व्यापक और विकसित हो। ज्ञान भी एक तरह का अनुभाव है, या तो वह हमारा अनुभव है या दूसरों का। उससे निकलते हैं निष्कर्ष, उससे होता है जीवन-विवेेक का विकास। यह विवके ही एक स्वप्न देता हे। यह स्वप्न परमावश्यक है। वह जीवन-स्वप्न है। वह आध्यात्मिक है, यौनिक भी।” मैंने पूछा, ”यौनिक का क्या अर्थ ?”

उसने कहा, ”हम अपूर्व शब्दावली में बात करते हैं। लेकिन जीवन के जिस क्षेत्र की हम बात करें उसकी शब्दावली आना चाहिए। क्या लेखक के लिए परम आवश्यक नहीं है कि वह विश्व-जनता के अभ्युत्थान को देखे और समाज का उत्पीड़न करनेवाली शक्तियों से सचेत हो और उसके प्रति विद्रोह करने वाली ताकतों से सक्रिय सहानुभूति रखे। ज्ञानात्मक आधार के विकास में तो बातें भी सम्मिलित हैं। नहीं हैं क्या ?”
मैंने सिर्फ इतना ही कहा, ”तुम तो मेरे बारे में जानते हो ! मेरा तो यह दृष्टिकोण बहुत पहले से रहा है और उसके लिए कुछ तकलीफ भी उठायी है।”जब हमने एक दूसरे की आँखो में देखा तो पाया कि हम सचमुच एक-दूसरे के मित्र हैं।

2 comments:

  1. waah waah
    man tript karne wala anupam aalekh
    ek atyant sundar aur sateek lekhanh ka udahran

    badhaai !

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  2. यह पीस एक मूलभूत प्रश्न उठाता है।
    मेरा भी मानना है कि व्यक्तिगत जीवन में बेईमान और असंबद्ध व्यक्ति प्रगतिशील कवि/लेखक हो नहीं सकता।

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