10 June, 2009

मैं उनका ही होता

मैं उनका ही होता जिनसे
मैंने रूप भाव पाए हैं।
वे मेरे ही हिये बंधे हैं
जो मर्यादाएँ लाए हैं।
मेरे शब्द, भाव उनके हैं
मेरे पैर और पथ मेरा,
मेरा अंत और अथ मेरा,
ऐसे किंतु चाव उनके हैं।
मैं ऊँचा होता चलता हूँ
उनके ओछेपन से गिर-गिर,
उनके छिछलेपन से खुद-खुद,
मैं गहरा होता चलता हूँ

7 comments:

  1. यह कविता तब पढी थी जब बस अभी पढना शुरू ही किया था। लंबे समय तक यह पूरी याद रही…अब भी गुनगुनाता हूं।
    नये कविओं के लिये एक ज़रूरी कविता।
    हां कुछ दिन रहने दिया करें कविताओं को…इतनी जल्दी जल्दी पढे जा सकeन वाले कवि नहीं मुक्तिबोध

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  2. "उनके छिछलेपन से खुद-खुद,
    मैं गहरा होता चलता हूँ"
    इन पंक्तियों की गहराई तक तो मैं आज भी नहीं पहुंच पाया हूँ .फिर अशोक जी की बात मानो कविताओं को कुछ दिन रहने दो लोग पुरानी पोस्ट तक जाने की जहमत नही उठाते

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  3. aap dono ke sujhav ke bad mujhe ehsas hua ki maine jaldibaji dikhayi. ab se har post itminan se karunga

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  4. कितने भाव छिपे हैं इस रचना meih ....... sundar रचना ..

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