01 July, 2011

पूंजीवादी समाज के प्रति

इतने प्राण, इतने हाथ, इतनी बुद्धि
इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि
इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति
यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति
इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद –
जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध
इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंध
तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध
तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध
तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र
तेरे ह्रास में भी रोग-कृमि हैं उग्र
तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।
मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक
अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक
तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।

9 comments:

  1. मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक
    अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक
    तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
    तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।
    Hmmm....sahee kahte hain!

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  2. लाजवाब अभिव्यक्ति...बधाई.

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  3. कैसी अग्नि थी मुक्तिबोध जी के शब्दों में! धन्यवाद रंगनाथ जी

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  4. तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
    तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र
    तेरे ह्रास में भी रोग-कृमि हैं उग्र
    तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।
    बहुत ही सुंदर शब्द चयन,
    आभार,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  5. कितना ताब , कितनी प्रवाह कितनी त्वरा !

    पिता, ओ पिता !
    नमन तुझ को......

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  6. छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंध
    तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
    देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध
    तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध
    ...teevra aakrosh jaayaj hai..
    muktibodh kee yaad taji karti rachna prastuti liye aabhar!

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  7. rangnaath jee, bahut hee jaandaar kaam! hamaare priy kavi par blog banaane ke liye. gujaarish yah hai ki har kavitaa ke pahle apnee thodee baaten bhee taank diyaa karen, achchhaa lagegaa.

    aur ek kavitaa 'main unakaa hee hotaa' padhne kaa man kar rahaa hai, lagaate to... aabhaaree houngaa.

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  8. मृत्युंजय, आपके उदार शब्दों के लिए आभार. 'मैं उनका ही होता' को प्रस्तुत कर रहा हूँ.

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  9. मृत्युंजय, कविता की भूमिका मैं जान बूझ कर नहीं लिखता. इसके पीछे दो कारण हैं. १- ताकि रचना की स्वतन्त्र प्रस्तुति हो. मुक्तिबोध की रचनाओं को मेरे निजी पाठ से से मुक्त रखने का एक प्रयास रहता है. २- दूसरों द्वारा मुक्तिबोध के बारे में लिखी सामग्री की एक स्वतन्त्र श्रेणी बनायी है. यदि कभी इतनी सलाहियत हुई कि मुक्तिबोध पर लिख सकूँ तो वही श्रेणी उसके लिए उचित जगह रहेगी.

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