30 अक्तूबर, 2011

मुक्तिबोध

हरिशंकर परसाई

राजनंदागांव में तालाब के किनारे पुराने महल का दरवाजा है - नीचे बड़े फाटक के आसपास कमरे हैं,दूसरी मंजिल पर एक बड़ा हाल और कमरे,तीसरी मंजिल पर कमरे और खुली छत। तीन तरफ से तालाब घेरता है। पुराने दरवाजे और खिड़कियां,टूटे हुए झरोखे,कहीं खिसकती हुई ईंटेंउखड़े हुए पलस्तर दीवारें। तालाब और आगे विशाल मैदान। शाम को जब ज्ञानरंजन और मैं तालाब की तरफ गए और वहां से धुंधलके में उस महल को देखा,तो एक भयावह रहस्य में लिपटा वह नजर आया।

दूसरी मंजिल के हाल के एक कोने में विकलांग मुक्तिबोध खाट पर लेटे थे। लगा,जैसे इस आदमी का व्यक्तित्व किसी मजबूत किले सा है। कई लड़ाईयों के निशान उस पर हैं। गोलों के निशान हैं,पलस्तर उखड़ गया है,रंग समय ने धो दिया है- मगर जिसकी मजबूत दीवारें नींव में जमी हैं और व​ह सिर ताने गरिमा के साथ खड़ा है।

मैंने मजाक ​कीइसमें तो ब्रह्मराक्षस ही रह सकता है।“

मुक्तिबोध की एक कविता है ‘ब्रह्मराक्षस’। एक कहानी भी है जिसमें शापग्रस्त राक्षस महल के खण्डहर में रहता है।

मुक्तिबोध हंसे। बोले, “कुछ भी कहो पार्टनर अपने को यह जगह पसंद है।“

मुक्तिबोध में मैत्री भाव बहुत था। बहुत-सी बातें वो मित्र को सम्बोधित करते हुए कहते थे। कविता,निबन्ध,डायरी सबमें यह ‘मित्र’ प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से रहता है। एक खास अदा थी उनकी वो मित्र को ‘पार्टनर’ कहते थे। कुछ इस तरह बातें करते थे - कुछ भी कहो पार्टनरतुम्हारा यह विनोद है ताकतवर...आपको चाहे बुरा लगे पार्टनर,पर अमुक आदमी अपने को तो बिल्कुल नहीं पटता।“ ज्यादा  प्यार में आते तो कहते कि “आप देखना मालक,ये सब भागते नजर आएंगे।“

मुक्तिबोध जैसे सपने में डूबते से बोले,जहां आप बैठे हैं। वहां किसी समय में राजा की महफिल जमती थी। खूब रोशनी की चकाचौंध थी। कुछ भी कहो,पार्टनर, ‘फ्युडलिज्म’ (सामन्तवाद) में एक शान तो थी...बरसात में आईये यहां। इस कमरे में रात को साइए। तालाब खूब जोर पर होता है,सांय-सांय हवा चलती है और पानी रात-भर दीवारों में टकराकर छप-छप करता है...कभीकभी तो ऐसा लगता है,जैसे कोई नर्तकी नाच रही हो,घुंघरुओं की आवाज सुनाई पड़ती है। पिछले साल शमशेर आए थे। हम लोग दो-तीन बजे सुबह तक सुनते रहे...और पार्टनर बहुत खूबसूरत उल्लू...मैं क्या बताउं आपसेवैसा खूबसूरत उल्लू मैंने कभी देखा ही नहीं...कभी चमगादड़ें घुस आती हैं....बड़े उत्साह से वे उस वातावरण की बातें करते रहे। अपनी बिमारी का जरा अहसास नहीं।

दोपहर में हम लोग पहुंचे थे। हमें देखा,तो मुक्तिबोध सदा की तरह- अरे वाह,अरे वाह !” कहते हुए हंसते रहे। मगर दूसरे ही क्षण उनकी आंखों में आंसु छलक पड़े। डेढ़-एक महीने पहले वो जबलपुर आए थे। एक्जिमा से परेशान थे। बहुत कमजोर। बोलते-बोलते दम फूल आता था। तब मुझे वे बहुत शंकाग्रस्त लगे थे। डरे हुए थे। तब भी उनकी आंखो में आंसू छलछला आए थे,जब उन्होंने कहा था- पार्टनर अब बहुत टूट गए हम। ज्यादा गाड़ी खिंचेगी नहीं। दस,पांच साल मिल जाएं,तो कुछ काम ​जमकर कर लूं।“

आंसू कभी पहले उनकी आंखों में नहीं देखे थे। इस पर हमलोग विशेष चिन्तित हुए। मित्रों ने बहुत जोर दिया कि आप यहां एक महीने रुककर चिकित्सा करा लें। पर उन्हें रुग्ण पिता को देखने नागपुर जाना था। सप्ताह-भर में लौट आने कर वादा करक वे चले गए। फिर,वे लौटे नहीं।

क्षण-भर में ही वे संभल गए। पूछा, “आप लोगों का सामान कहां है ?

शरद कोठारी ने कहा, “मेरे घर रखा है।“

वे बोले,वाह साहब,इसका क्या मतलब आप लोग मेरे यहां आए हैं न ?

हम लोगों ने परस्पर देखा। शरद मुस्कराया। इस पर हम लोग मुक्तिबोध को कई बार चिढ़ाया करते थे— गुरू,कितने ही प्रगतिशील विचार हों,आपके,आदतों में फ्यूडल हो।

मेरा मेहमान हैमेरे घर सोएगा,मेरे घर खाएगा,कोई बिना चाय पिए नहीं जाएगा,होटल में मैं ही पैसे चुकाउंगा,सारे शहर को घर में खाना खिलाउंगा-यह सब क्या है ?

शरद को मुस्कराते देख वे भी मु​स्करा दिए। बोले,यह आपकी अनधिकार चेष्टा है,बल्कि साजिश है।

यह औपचारिक नहीं था। मुक्तिबोध की किसी भावना में औपरचारिकता नहींन स्नेह मेंन घृणा में,न क्रोध में। जिसे पसन्द नहीं करते थेउसकी तरफ घण्टे-भर बिना बोले आंख फाड़े देखते रहते थे। वह घबरा जाता था।

बिमारी की बात की,तो वैज्ञानिक तटस्थता से-जैसे ये हाथ-पांव और यह सिर उनके नहीं,किसी दूसरे के हैं। बड़ी निर्वैयक्तिकता से,जैसे किसी के अंग-अंग काटकर बात रहे हैं कि बीमारी कहां है,कैसे हुईक्या परिणाम है ?

तो यह है साहब,अपनी बीमारी—-बोलकर चुप हो गए।

फिर बोले, “चिट्ठियां आती हैं कि आप यहां आ जाइए या वहां चले जाइए। पर कैसे जाउं जाना क्या मेरे वश की बात है ?...हां,एक भयंकर कविता हो गई। सुनाउंगा नहीं। मुझे खुद उससे डर लगता है। बेहद डार्क,ग्लूमी ! भयंकर इमेंजें हैं। न जाने कैसी मन:स्थिती थी। कविता वात्सयायन जी को भेज दी है।...पर अब लगता है कि वैसी बात है नहीं। जिन्दगी में दम है। बहुत अच्छे लोग हैं,साथ। कितनी चिट्ठियां चिन्ता की आयी हैं। कितने लोग मुझे चंगा करना चाहते हैं ! कितना स्नेह,कितनी ममता है,आसपास!...पार्टनर,अब एक दूसरी कविता लिखी जाएगी। यानी ठीक बात लिखी जाएगी।"

ज्ञानरंजन ने कहापिछली भी सही थी और अब जो होगी,वह भी सही होगी।“

वे आश्वस्त-से लगे। हम लोगों ने समझाया कि बीमारी मामूली है,भोपाल में एक-दो महीने में ठीक हो जाएगी।

उनकी आंखों में चमक आ गई। बोले, “ठीक हो जाएगी न! मेरा भी यही ख्याल है। न हो पूरी ठीक,कोई बात नहीं। मैं लंगड़ाकर चल लूंगा। पर लिखने-पढ़ने लायक हो जाऊँ।“

इतने में प्रमोद वर्मा आ गए। देखते ही मुक्तिबोध फिर हंस पड़े,लो, “अरे लोये भी आ गए ! वाह,बड़ा मजा है साहब!”

प्रमोद और मैं शान्ता भाभी तथा रमेश से सलाह करने दूसरे कमरे में चले गए। इधर मुक्तिबोध ज्ञानरंजन से नए प्रकाशनों पर बातें करने लगे।

तय हुआ कि जल्दी भोपाल ले चलना चाहिए। मित्रों ने कुछ पैसा जहां-तहां से भेज दिया था। हम लोगों ने सलाह की कि इस रमेश के नाम से बैंक में जमा कर देना चाहिए।

मुक्तिबोध पर बड़ी विचित्र प्रतिक्रिया हुई इसकी। बिल्कुल बच्चे की तरह वे खीझ उठे। बोले,क्यों मेरे नाम से खाता क्यों नहीं खुलेगा मेरे ही नाम से जमा होना चाहिए। मुझे क्या आप लोग गैर-जिम्मेदार समझते हैं।

वे अड़ गए। खाता मेरे नाम से खुलेगा। थोड़ी देर बाद कहने लगे,बात यह है पार्टनर मेरी इच्छा है ​ऐसी। ‘आई विश इट।‘ मैं नहीं जानता कि बैंक में खाता होना कैसा होता है। एक नया अनुभव होगा मेरे लिए। तर्कहीन लालसा हो-पर है जरूर,कि एक बार अपना भी एकाउण्ट हो जाए! जरा इस सन्तोष को भी देखूं।

मुक्तिबोध हमेशा ही घोर आर्थिक संकट में रहते थे.अभावों का ओर-छोर नहीं था. कर्ज से लदे रहते थे. पैसा चाहते थे, पर पैसे को ठुकराते भी थे.

पैसे के लिए कोई काम विश्वास के प्रतिकूल नहीं किया। अचरज होता था कि जिसे पैसे-पैसे की तंगी है।वह रुपयों का मोह बिना खटके के कैसे छोड़ देता है। बैंक में खाता खुलेगा- यह कल्पना उनके लिए बड़ी उत्तेजक थी। गजानन माधव मुक्तिबोध का बैंक खाता है - यह अहसास वे करना चाहते थे। वे शायद अधिक सुरक्षित भी अनुभव करते।

तभी एक ज्येष्ठ लेखक की चिट्ठी आई कि आप घबराएं नहींहम कुछ लेखक जल्दी ही अखबार में आपकी सहायता के लिए अपील प्रकाशित करा रहे हैं।

चिट्ठी पढ़कर मुक्तिबोध बहुत उत्तेजित हो गए। झटके से तकिए पर थोड़े उठ गए और बोले, “यह क्या है दया के लिए अपील निकलेगी ! अब,भीख मांगी जाएगी मेरे लिए ! चन्दा होगा ! नहीं- मैं कहता हूं-यह नहीं होगा। मैं अभी मरा थोड़े ही हूं। मित्रों की सहायता मैं ले लूंगा-लेकिन मेर लिए चन्द्र की अपील! नहीं। यह नहीं होगा !”

हम लोगों ने उन्हें समझाया कि आपकी भावना से उन्हें परिचित करा दिया जाएगा और अपील नहीं निकलेगी।

उस शाम रमेश ने एक चिट्ठी लाकर दी जिसमें बीस रुपए के नोट थे। चिट्ठी उनके एक विद्यार्थी की थी। उसने लिखा था कि मैं एक जगह काम करके पढ़ाई का खर्चा चला रहा हूं। आपके प्रति मेरी श्रद्धा है। मैं देख रहा हूं कि अर्थाभाव के कारण आप जैसे साहित्यकार की ठीक चिकित्सा नहीं हो पा रही है। मैं ये बीस रुपए बचाए हैं। इन्हें आप ग्रहण करें। ये मेरी ही कमाई के हैं,इसलिए आप इन्हें लेने में संकोच न करें। स्वयं आपको रुपए देने का साहस मुझमें नहीं है,इसलिए इस तरह पहुंचा रहा हूं।

चिट्ठी और रुपए लिए वो बहुत देर तक खिड़की के बाहर देखते रहे। उनकी आंखे भर आयीं। बोलेयह लड़का गरीब है। उससे कैसे पैसे ले लूं ?

वहां एक अध्यापक बैठे थे। उन्होंने कहा,लड़का भावुक है। वापस कर देंगेतो उसे चोट पहुंचेगी। मुक्तिबोध बहुत द्रवित हो गए इस स्नेह से। बड़ी देर तक गुमसुम बैठे रहे।

भोपाल जाने की तैयारी होने लगी। उनका मित्र-भाव फिर जाग उठा। मुझसे कहने लगे, “पार्टनर,मैं आपसे एक साफ बात कहना  चाहता हूं। बुरा मत मानना। देखिए, आपकी जीविका लिखने से  चलती है। आप अब भोपाल मेरे साथ चलेंगे। वहां रहेंगे। आप लिख नहीं पाएंगे,तो आपको आर्थिक कष्ट होगा। मैं कहता हूं कि आप मेरे पैसे को अपना पैसा समझकर उपयोग में लाइए !”

मुक्तिबोध बहुत गम्भीर थे। हम लोग एक-दूसरे की तरफ देख रहे थे।

वे मेरी तरह जवाब के लिए आंखे उठाए थे और हम लोग हंसी रोके थे।

तभी मैंने कहा,आपके पैसे को अपना पैसा समझने को तैयार हूं। पर पैसा है कहां ?

प्रमोद जोर से हंस दिया। मुक्तिबोध भी हंस पड़े। फिर एकदम गम्भीर हो गए। बोले,  हां,यही तो मुश्किल है। यही तो गड़बड़ है।“

जो थोड़े से पैसे उनके हाथ में आ गए थे,वे कुलबुला रहे थे। उन्हें कितने ही कर्तव्य याद आ रहे थे। कोई मित्र कष्ट में है,किसी की पत्नी बीमार है,किसी की लड़की बीमार है,किसी के बच्चों के लिए कपड़े बनवाना है। उस अवस्था में जब वे खुद अपंग हो गए थे और अर्थाभाव से पीड़ित थे,वे दूसरों पर इन पैसों को खर्च कर देना चाहते थे। आगे भोपाल में तो इस बात पर उनसे बाकायदा युद्ध हुआ और बड़ी मुश्किल से हम उन्हें समझा सके कि रोगी क किसी के प्रति कोई कर्तव्य नहीं होतासबके कर्तव्य उसके प्रति होते हैं।

और उस रात जब हम लोग गाड़ी पर चढ़े तो साथ मे रीमों कागज था। मुक्तिबोध ने  हठ करके पूरी ​कविताएं,अधूरी कविताएं,तैयार पाण्डुलिपियां बस लदवा लीं। बोले, “यह सब मेरे साथ जाएगा। एकाध हफ्ते बाद मैं कुछ काम करने लायक हो जाउंगातो कविताएं पूरी करूंगा,नई लिखूंगा। और पाण्डुलिपियां दुरूस्त करूंगा। अपने से अस्पताल में बेकार पड़ा नहीं रहा जाएगा,पार्टनर!.....और हां,वह पासबुक रख ली है ?

पर उन कागजों पर मुक्तिबोध का न फिर हाथ चल सका और न वे एक चेक काट सके।

जिन्दगी बिना कविता-संग्रह देखे और बिना चेक काटे गुजर गई।

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